KNEWS DESK – ईरान और अमेरिका के बीच भले ही हाल ही में एक नए समझौते पर दस्तखत हो गए हों, लेकिन असल कहानी अभी शुरू हुई है। दोनों देशों के बीच विवादित मुद्दों पर सहमति बनाना आसान नहीं माना जा रहा है और विशेषज्ञों के मुताबिक यह प्रक्रिया महीनों तक खिंच सकती है।
एमओयू साइन, लेकिन असली बातचीत बाकी
17 जून को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने एक एमओयू पर साइन कर वैश्विक स्तर पर सकारात्मक संकेत दिए, लेकिन इसे अंतिम समझौता नहीं माना जा रहा है।
अब आगे परमाणु कार्यक्रम, होर्मुज जलडमरूमध्य और प्रतिबंधों जैसे कई संवेदनशील मुद्दों पर विस्तृत बातचीत होगी।
60 दिन की टाइमलाइन, लेकिन अनिश्चितता ज्यादा
रिपोर्ट्स के मुताबिक शुरुआती तौर पर 60 दिनों की बातचीत की योजना बनाई गई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह समय और बढ़ सकता है। लेबनान में अमेरिकन यूनिवर्सिटी के फेलो रमी खूरी के अनुसार, यह प्रक्रिया तय समय से कहीं अधिक लंबी हो सकती है।
जटिल मुद्दों पर टिकी बातचीत
दोनों देशों के बीच जिन मुद्दों पर सहमति बनानी है, वे बेहद संवेदनशील हैं—
- यूरेनियम से जुड़ी शर्तें
- होर्मुज से माइंस हटाने की प्रक्रिया
- आर्थिक प्रतिबंधों में राहत
- युद्ध और नुकसान का मुआवजा
इन सभी बिंदुओं पर तकनीकी और राजनीतिक स्तर पर गहन चर्चा जरूरी होगी।
2015 की डील से सीख
इससे पहले ईरान न्यूक्लियर डील (JCPOA) पर 2015 में समझौता हुआ था, जिसकी बातचीत 2013 से चल रही थी और इसे 2016 में लागू किया गया था। उस समझौते में अमेरिका, ईरान के अलावा चीन, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी भी शामिल थे।
2018 में अमेरिका ने इस समझौते से खुद को अलग कर लिया था, जिसके बाद ईरान ने भी शर्तों का पालन सीमित कर दिया। इसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में लगातार तनाव बढ़ता गया।