खुलने जा रहा है होर्मुज! 3 रिपोर्ट से समझिए भारत में तेल-गैस सप्लाई कब तक होगी सामान्य

KNEWS DESK – ईरान और अमेरिका के बीच समझौते के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की प्रक्रिया तेज हो गई है। इसके साथ ही वैश्विक ऊर्जा सप्लाई चेन धीरे-धीरे पटरी पर लौटने की उम्मीद जताई जा रही है, लेकिन पूरी स्थिति सामान्य होने में अभी समय लग सकता है।

होर्मुज में क्या हो रहा है बदलाव?

समझौते के बाद सबसे पहले होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर लगी अमेरिकी नाकाबंदी हटाने की प्रक्रिया शुरू होगी। इसके बाद ईरान समुद्री क्षेत्र में बिछाई गई बारूदी सुरंगों (माइंस) को हटाने का काम करेगा, ताकि शिपिंग रूट सुरक्षित हो सके।

भारत पर क्यों अहम है होर्मुज?

भारत अपनी कुल कच्चे तेल जरूरत का लगभग 46% हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आयात करता है। इसके अलावा कतर से आने वाली एलएनजी (LNG) सप्लाई भी इसी मार्ग पर निर्भर है, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा सीधे तौर पर जुड़ी है।

सप्लाई कब तक सामान्य होगी? तीन बड़े अनुमान

1. 60 दिनों में आंशिक सुधार

रिपोर्ट्स के मुताबिक कतर ने रास लाफान टर्मिनल से गैस निर्यात प्रक्रिया दोबारा शुरू कर दी है। अनुमान है कि अगले 60 दिनों में गैस सप्लाई युद्ध-पूर्व स्थिति के करीब पहुंच सकती है।

2. 180 दिन में पूरी सफाई

कुछ रक्षा विश्लेषकों और पेंटागन की रिपोर्ट के अनुसार, समुद्री रास्ते में बिछी माइंस को पूरी तरह हटाने में करीब 6 महीने (180 दिन) तक लग सकते हैं। तब जाकर रूट पूरी तरह सुरक्षित माना जाएगा।

3. 30 दिन में शुरुआती रिकवरी

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे टैंकरों की आवाजाही पहले ही शुरू हो चुकी है और 30 दिनों के भीतर सप्लाई में सुधार दिखने लगेगा, हालांकि पूर्ण स्थिरता अभी दूर है।

ईरान खुद बढ़ाएगा तेल सप्लाई

समझौते के बाद ईरान पर लगे कई प्रतिबंधों में राहत मिलने की उम्मीद है, जिससे वह अपने तेल निर्यात को तेजी से बढ़ा सकता है। अनुमान है कि ईरान के पास करीब 100 करोड़ बैरल कच्चे तेल का भंडार मौजूद है, जिसे वह बाजार में उतार सकता है।

पहले प्रतिबंधों के कारण भारत सीधे ईरान से तेल नहीं खरीद पा रहा था, लेकिन नई स्थिति में व्यापार के रास्ते खुलने की संभावना बन रही है।

भारत के लिए क्या बदलेगा?

अगर होर्मुज पूरी तरह खुलता है तो:

  • कच्चे तेल की सप्लाई स्थिर होगी
  • LNG आयात आसान होगा
  • वैश्विक कीमतों में गिरावट संभव हो सकती है

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि असली स्थिति समझौते के क्रियान्वयन और जमीनी सुरक्षा व्यवस्था पर निर्भर करेगी।