Knews Desk- यूरोप इन दिनों भीषण हीटवेव की चपेट में है. कई देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है और रिपोर्ट्स के मुताबिक गर्मी की वजह से 1300 से अधिक लोगों की मौत होने की आशंका जताई गई है. यह पहली बार नहीं है जब यूरोप में हीटवेव ने इतनी तबाही मचाई हो. इससे पहले भी कई बार अत्यधिक गर्मी लोगों की जान ले चुकी है. भारत में भी हर साल लू और हीट स्ट्रोक से सैकड़ों लोगों की मौत होती है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर गर्मी कब और कैसे इंसान के लिए जानलेवा बन जाती है? क्या सिर्फ 45 या 50 डिग्री तापमान ही खतरनाक होता है या इसके पीछे कोई और विज्ञान भी काम करता है?
अक्सर लोगों को लगता है कि केवल बहुत ज्यादा तापमान ही मौत का कारण बनता है, लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता. कई बार 38 से 40 डिग्री तापमान भी जानलेवा साबित हो सकता है, खासकर तब जब हवा में नमी (Humidity) बहुत अधिक हो. वैज्ञानिक सिर्फ तापमान नहीं, बल्कि हीट इंडेक्स (Heat Index) को ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं. हीट इंडेक्स तापमान और हवा में मौजूद नमी को मिलाकर यह बताता है कि शरीर वास्तव में कितनी गर्मी महसूस कर रहा है.मानव शरीर का सामान्य तापमान लगभग 37 डिग्री सेल्सियस होता है. शरीर इस तापमान को बनाए रखने के लिए लगातार काम करता रहता है. जब बाहर गर्मी बढ़ती है तो शरीर पसीना निकालता है. पसीना त्वचा से वाष्पित होकर शरीर की अतिरिक्त गर्मी को बाहर निकाल देता है और शरीर ठंडा बना रहता है. यही शरीर का प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम है.
समस्या तब शुरू होती है जब वातावरण बहुत गर्म होने के साथ-साथ बेहद नम भी हो. ऐसी स्थिति में पसीना आसानी से नहीं सूखता. जब पसीना वाष्पित नहीं हो पाता तो शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकलती और शरीर का अंदरूनी तापमान तेजी से बढ़ने लगता है. यही स्थिति आगे चलकर हीट स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्या पैदा कर सकती है.विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक तेज धूप में रहना, पर्याप्त पानी न पीना, लगातार शारीरिक मेहनत करना, बंद कमरों में बिना वेंटिलेशन के रहना और गर्म वातावरण में लंबे समय तक काम करना हीट स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ा देता है. अगर तापमान 38 डिग्री हो और हवा में नमी 70 प्रतिशत हो तो शरीर को यह तापमान 45 डिग्री या उससे भी अधिक महसूस हो सकता है. इसलिए कई बार अपेक्षाकृत कम तापमान भी बेहद खतरनाक साबित होता है.
जब शरीर का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक पहुंच जाता है तो हीट स्ट्रोक की स्थिति बन सकती है. यह एक मेडिकल इमरजेंसी है. इसमें व्यक्ति का दिमाग, दिल, फेफड़े और अन्य महत्वपूर्ण अंग प्रभावित होने लगते हैं. समय पर इलाज न मिलने पर यह स्थिति जानलेवा साबित हो सकती है.हीट स्ट्रोक का खतरा सभी लोगों के लिए समान नहीं होता. 60 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग, छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएं, खेतों, फैक्ट्रियों और निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूर, खिलाड़ी तथा हृदय रोग, डायबिटीज और किडनी की बीमारी से पीड़ित लोगों में इसका जोखिम अधिक होता है. इन लोगों का शरीर गर्मी से लड़ने में अपेक्षाकृत कमजोर होता है.
शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन भी हीट स्ट्रोक का बड़ा कारण बनता है. अधिक पसीना आने से शरीर से पानी और जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स बाहर निकल जाते हैं. यदि समय पर पानी, ओआरएस या अन्य तरल पदार्थ न लिए जाएं तो ब्लड सर्कुलेशन प्रभावित होने लगता है और शरीर की तापमान नियंत्रित करने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है. यही वजह है कि गर्मी के दिनों में बार-बार पानी पीने की सलाह दी जाती है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, अत्यधिक गर्मी मौसम से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में शामिल है. हीट स्ट्रोक न केवल सीधे जानलेवा हो सकता है, बल्कि यह दिल की बीमारी, डायबिटीज, अस्थमा और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को भी गंभीर बना सकता है. इसलिए भीषण गर्मी के दौरान लापरवाही करना भारी पड़ सकता है.विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि दोपहर की तेज धूप में बाहर निकलने से बचें, पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं, हल्के और सूती कपड़े पहनें, शरीर में पानी की कमी न होने दें और हीट स्ट्रोक के लक्षण जैसे तेज बुखार, चक्कर आना, बेहोशी या भ्रम की स्थिति दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सकीय सहायता लें. सही सावधानी और समय पर उपचार से ही हीटवेव के खतरों से बचा जा सकता है.