Knews Desk– मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े संकट का असर अब भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र पर भी दिखाई देने लगा है। देशभर के कई अस्पतालों में कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली महत्वपूर्ण कीमोथेरेपी दवाएं सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन की कमी की शिकायतें सामने आ रही हैं। डॉक्टरों का कहना है कि यदि जल्द स्थिति नहीं सुधरी तो हजारों मरीजों के इलाज पर गंभीर असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन कई प्रकार के कैंसर, जैसे फेफड़ों, गर्भाशय ग्रीवा, सिर-गर्दन और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर के उपचार में अहम भूमिका निभाती हैं। इन दवाओं की उपलब्धता कम होने से मरीजों के इलाज में देरी हो सकती है या डॉक्टरों को वैकल्पिक उपचार अपनाने पड़ सकते हैं।
दवा उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता और होर्मुज मार्ग पर बढ़ी अनिश्चितता के कारण कच्चे माल और सक्रिय औषधीय तत्वों (API) की आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसके अलावा प्लैटिनम की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने भी इन दवाओं के उत्पादन को महंगा और कई कंपनियों के लिए कम लाभकारी बना दिया है।
देश के बड़े अस्पतालों ने फिलहाल अपने सीमित स्टॉक के सहारे काम चलाया है, लेकिन कई जगह भंडार तेजी से घट रहे हैं। डॉक्टरों ने केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है ताकि दवाओं की आपूर्ति सामान्य हो सके और मरीजों को परेशानी का सामना न करना पड़े।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज संकट लंबा खिंचता है तो सिर्फ कैंसर की दवाएं ही नहीं, बल्कि अन्य जरूरी दवाओं की कीमतों और उपलब्धता पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे में दवा आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित रखना सरकार और उद्योग दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।