दवाओं की कीमतों में हर साल करीब 7% इजाफा, नकली दवाओं का खतरा भी बरकरार; जानिए क्यों महंगा हो रहा इलाज

Knews Desk- इलाज कराने के बाद सबसे ज्यादा चिंता अगर किसी चीज की होती है तो वह है दवाइयों का बढ़ता खर्च। अब सरकार के आंकड़ों ने भी इस चिंता को काफी हद तक सही साबित किया है। केंद्र सरकार के मुताबिक, पिछले तीन वर्षों में नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं की कीमतों में औसतन 6.94 फीसदी की सालाना बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, नियमों के तहत कंपनियां इन दवाओं की कीमत एक साल में अधिकतम 10 फीसदी तक ही बढ़ा सकती हैं।

दूसरी तरफ, दवाओं की कीमत बढ़ने के साथ उनकी गुणवत्ता को लेकर भी सवाल बने हुए हैं। साल 2025-26 में देशभर में जांचे गए 1,41,322 दवा नमूनों में से 3,012 नमूने घटिया और 283 नकली या मिलावटी पाए गए। यानी कुल 3,295 नमूने तय गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे।

सरकार की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में 9,104 दवा नमूने घटिया और 810 नमूने नकली या मिलावटी पाए गए। अकेले 2025-26 में 3,295 ऐसे नमूने सामने आए। औसतन देखें तो हर दिन करीब 9 दवा नमूने गुणवत्ता जांच में फेल हुए।

इन मामलों में कार्रवाई की जिम्मेदारी संबंधित राज्य लाइसेंसिंग अथॉरिटी की होती है। नियमों का उल्लंघन मिलने पर दवा कंपनी या निर्माता का लाइसेंस निलंबित अथवा रद्द किया जा सकता है। इसके अलावा अदालत में मुकदमा भी चलाया जा सकता है। 2025-26 में ऐसे मामलों में 779 मुकदमे दर्ज किए गए, हालांकि यह आंकड़ा अभी अस्थायी है।

दवाओं की कीमत कौन तय करता है?

लोकसभा में सांसद हनुमान बेनीवाल और राजकुमार रोत के सवाल के जवाब में रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने दवाओं की कीमतों से जुड़ी जानकारी दी।

सरकार के मुताबिक, देश में दवाओं की कीमतों को Drugs Price Control Order यानी DPCO, 2013 के तहत नियंत्रित किया जाता है। नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी यानी NPPA, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के फार्मास्युटिकल्स विभाग के तहत काम करती है और नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स यानी NLEM के आधार पर जरूरी दवाओं की अधिकतम कीमत तय करती है।

23 जुलाई 2026 तक 935 फॉर्मूलेशन की सीलिंग प्राइस प्रभावी थी। वहीं NLEM 2022 के तहत कीमतों को दोबारा तय किए जाने के बाद औसतन करीब 17 फीसदी की कमी दर्ज की गई। इसके अलावा NPPA अब तक 3,845 नई दवाओं की खुदरा कीमतें भी निर्धारित कर चुकी है।

शेड्यूल्ड और नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं में अंतर

दवाओं की कीमतों को समझने के लिए शेड्यूल्ड और नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं का अंतर जानना जरूरी है। शेड्यूल्ड दवाएं वे होती हैं जो NLEM में शामिल होती हैं और DPCO, 2013 की Schedule-I सूची का हिस्सा हैं। इन दवाओं की अधिकतम कीमत सरकार की ओर से तय की जाती है और कंपनियां निर्धारित सीमा से ज्यादा कीमत पर इन्हें नहीं बेच सकतीं।

इसके उलट, नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं NLEM की सूची में शामिल नहीं होतीं। इनकी कीमत सरकार सीधे तय नहीं करती। निर्माता अपनी कीमत निर्धारित कर सकते हैं, लेकिन उन्हें 12 महीने की अवधि में MRP में 10 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी की अनुमति नहीं है। यही वजह है कि नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी का असर मरीजों की जेब पर ज्यादा दिखाई देता है।

तीन साल में कैसे बढ़ीं दवाओं की कीमतें?

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं की कीमतें पिछले तीन वर्षों में औसतन 6.94 फीसदी सालाना बढ़ी हैं।

वहीं शेड्यूल्ड दवाओं की कीमतों में WPI यानी Wholesale Price Index के आधार पर बदलाव किया गया। साल 2024 में यह बढ़ोतरी 0.00551 फीसदी, 2025 में 1.74028 फीसदी और 2026 में 0.64956 फीसदी रही।

सरकार का दावा है कि जनऔषधि केंद्रों के जरिए मरीजों को कई दवाएं बाजार कीमत की तुलना में 50 से 80 फीसदी तक कम दाम में उपलब्ध कराई जाती हैं। इसके अलावा अमृत फार्मेसी में कैंसर और हृदय रोग की दवाओं तथा इम्प्लांट पर औसतन 50 फीसदी तक की छूट दी जाती है। सरकारी अस्पतालों में जरूरी दवाओं को मुफ्त उपलब्ध कराने का भी प्रावधान है।

आखिर दवाएं महंगी क्यों हो रही हैं?

दवाओं की बढ़ती कीमतों के पीछे कई कारण हैं। इनमें कच्चे माल की कीमत, सप्लाई चेन में बाधा, अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव और मुद्रा विनिमय दर में बदलाव प्रमुख हैं।

हाल के मिडिल ईस्ट संकट के दौरान कंटेनर जहाजों की उपलब्धता प्रभावित होने से चीन से आने वाले Active Pharmaceutical Ingredients यानी API की सप्लाई पर भी असर पड़ा। इसके चलते कुछ रसायनों की कीमतों में 200 से 300 फीसदी तक की वृद्धि हुई।

कच्चे माल की बढ़ती लागत का असर जरूरी दवाओं पर भी पड़ा। सरकार ने 384 आवश्यक दवाओं की कीमतों में आपातकालीन बढ़ोतरी पर विचार किया। कैंसर की प्लैटिनम आधारित दवाओं और बच्चों के कुछ टीकों की कीमतों में भी कच्चे माल की कमी और विदेशी मुद्रा दरों में बदलाव के कारण 50 फीसदी तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

इसके अलावा शेड्यूल्ड दवाओं की कीमतों में WPI के आधार पर होने वाला सालाना बदलाव भी कीमतों को प्रभावित करता है।

सस्ती और भरोसेमंद दवा अब भी बड़ी चुनौती

सरकार ने दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए DPCO और NPPA जैसी व्यवस्थाएं बनाई हैं। जनऔषधि और अमृत फार्मेसी जैसी योजनाओं के जरिए सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने की कोशिश भी जारी है।

लेकिन दूसरी तरफ नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी और बड़ी संख्या में घटिया, नकली और मिलावटी दवाओं के नमूने सामने आना चिंता का विषय है।

ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि दवा कितनी महंगी हो गई, बल्कि यह भी है कि मरीज को जो दवा मिल रही है वह कितनी सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण है। बढ़ती कीमतों और दवा की गुणवत्ता से जुड़ी चुनौतियों के बीच आम आदमी के लिए सस्ती और भरोसेमंद दवा उपलब्ध कराना अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।

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