knews desk – प्रियदर्शन की फिल्म ‘हैवान’ को लेकर दर्शकों में काफी उत्साह था. इसकी सबसे बड़ी वजह है अक्षय कुमार और सैफ अली खान की जोड़ी, जो 90 के दशक में ‘मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी’ जैसी फिल्मों से दर्शकों का मनोरंजन कर चुकी है. इस बार दोनों सितारे कॉमेडी नहीं, बल्कि एक खतरनाक टकराव के लिए आमने-सामने हैं.
फिल्म मलयालम की चर्चित फिल्म ‘ओप्पम’ का हिंदी रूपांतरण है. प्रियदर्शन ने एक बार फिर अपनी पुरानी कहानी को नए कलाकारों के साथ पेश किया है. कागज पर फिल्म का कॉन्सेप्ट काफी दिलचस्प नजर आता है, लेकिन क्या यह पर्दे पर भी उतना ही असर छोड़ती है? आइए जानते हैं.
क्या है ‘हैवान’ की कहानी?
फिल्म की कहानी श्याम राणे (सैफ अली खान) के इर्द-गिर्द घूमती है. श्याम एक नेत्रहीन व्यक्ति है, लेकिन उसकी सुनने और महसूस करने की क्षमता बेहद तेज है. वह मुंबई की एक पॉश सोसाइटी में मेंटेनेंस इंचार्ज के तौर पर काम करता है और अपने परिवार की जिम्मेदारियां संभालता है.
इसी सोसाइटी में जज प्रधान (बोमन ईरानी) भी रहते हैं. सबकुछ सामान्य चल रहा होता है, तभी कहानी में परशुराम गोखले (अक्षय कुमार) की एंट्री होती है. परशुराम के परिवार पर कभी झूठा कलंक लगा था, जिसके बाद उसके घरवालों ने आत्महत्या कर ली थी. इस घटना के बाद वह मानसिक रूप से टूट जाता है और बदले की आग में जलने लगता है.
पागलखाने से भागने के बाद परशुराम एक खतरनाक हत्यारा बन जाता है. वह अपने रास्ते में आने वाले लोगों को खत्म करने पर तुला है. ऐसे में श्याम अनजाने में उसके और एक मासूम जिंदगी के बीच दीवार बन जाता है.
फिल्म की कहानी का सबसे मजबूत हिस्सा यही है कि एक नेत्रहीन इंसान अपनी सूझबूझ और हिम्मत के दम पर एक खूंखार अपराधी का सामना करता है. हालांकि, कहानी को जिस तरह आगे बढ़ाया गया है, उसमें कई जगह रफ्तार की कमी महसूस होती है.
डायरेक्शन और राइटिंग में कहां चूकी फिल्म?
प्रियदर्शन की फिल्मों में हास्य और मनोरंजन का खास अंदाज देखने को मिलता है. ‘हैवान’ में भी उन्होंने सस्पेंस और कॉमेडी का मिश्रण तैयार करने की कोशिश की है. कुछ जगहों पर यह प्रयोग काम करता है, लेकिन कई बार फिल्म का टोन असंतुलित हो जाता है.
थ्रिलर फिल्म में जहां हर सीन दर्शकों की उत्सुकता बढ़ाना चाहिए, वहीं यहां बीच-बीच में गाने और कॉमेडी के लंबे हिस्से कहानी की गति धीमी कर देते हैं. खासकर जब विलेन का खतरा बढ़ रहा होता है, तब अचानक हल्के-फुल्के दृश्य सस्पेंस का असर कम कर देते हैं.
फिल्म की एडिटिंग पर थोड़ी और मेहनत की जाती, तो यह ज्यादा प्रभावशाली बन सकती थी. करीब 25 से 30 मिनट की अतिरिक्त सामग्री हटाने से कहानी ज्यादा चुस्त और रोमांचक हो सकती थी.
एक्टिंग में किसने मारी बाजी?
सैफ अली खान
सैफ अली खान ने श्याम राणे के किरदार को काफी सहजता से निभाया है. एक नेत्रहीन व्यक्ति की परेशानियों, परिवार के प्रति उसकी चिंता और मुश्किल हालात में हिम्मत बनाए रखने की कोशिश को उन्होंने अच्छी तरह पर्दे पर उतारा है.
इमोशनल दृश्यों में सैफ का अभिनय प्रभावशाली है. हालांकि, एक्शन वाले कुछ दृश्यों में उनकी बॉडी लैंग्वेज थोड़ी असहज लगती है. इसके बावजूद उनका प्रदर्शन फिल्म की बड़ी ताकत है.
अक्षय कुमार
अक्षय कुमार ने परशुराम गोखले के किरदार में एक खतरनाक और सनकी हत्यारे का रूप धारण किया है. उनकी एंट्री दमदार है और कई दृश्यों में उनका खौफ भी नजर आता है.
हालांकि, कुछ जगहों पर उनका अभिनय जरूरत से ज्यादा आक्रामक हो जाता है. एक साइकोपैथ विलेन के किरदार में जिस तरह की ठंडी और खामोश सनक होनी चाहिए, वह हर सीन में दिखाई नहीं देती. फिर भी अक्षय ने अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय करने की कोशिश की है.
शारिब हाशमी और बाकी कलाकार
पुलिस इंस्पेक्टर संजय शिंदे के रोल में शारिब हाशमी ने शानदार काम किया है. उनकी कॉमिक टाइमिंग और देसी अंदाज फिल्म को हल्का बनाए रखते हैं. जब भी वह स्क्रीन पर आते हैं, दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है.
बोमन ईरानी ने जज प्रधान के किरदार में अपनी गरिमा बनाए रखी है. वहीं, दिवंगत अभिनेता असरानी को बूढ़े दरबान हुसैन के रूप में देखना भावुक कर देता है. छोटे से रोल में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी है.
सैयामी खेर और श्रेया पिलगांवकर के हिस्से सीमित सीन आए हैं. इससे उनके किरदारों का प्रभाव उतना नहीं बन पाता, जितनी उम्मीद की जा सकती थी. फिल्म में मोहनलाल का कैमियो भी है, जो ओरिजिनल फिल्म के प्रशंसकों के लिए खास आकर्षण है.
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत और कमजोरी
‘हैवान’ की सबसे बड़ी ताकत इसका इमोशनल कलेवर है. एक ऐसा व्यक्ति, जो देख नहीं सकता, अपनी समझ और हिम्मत के दम पर एक खतरनाक हत्यारे का सामना करता है. यह कॉन्सेप्ट अपने आप में काफी प्रभावशाली है.
फिल्म में देसी ह्यूमर और पुलिसिया नोंकझोंक भी है, जो इसे पूरी तरह गंभीर होने से बचाती है. इसी वजह से यह परिवार के साथ देखी जा सकने वाली फिल्म बनती है.
हालांकि, इसकी सबसे बड़ी कमजोरी लंबी अवधि और धीमी रफ्तार है. थ्रिलर में दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखने के लिए कहानी का लगातार आगे बढ़ना जरूरी होता है. ‘हैवान’ में कई जगह सस्पेंस कमजोर पड़ जाता है.
क्लाइमैक्स से भी जिस बड़े धमाके की उम्मीद होती है, फिल्म वहां उतना असर नहीं छोड़ पाती. अंत को और ज्यादा प्रभावशाली बनाया जा सकता था.
अगर आप अक्षय कुमार और सैफ अली खान की जोड़ी के प्रशंसक हैं, तो ‘हैवान’ आपके लिए एक दिलचस्प फिल्म हो सकती है. फिल्म में सस्पेंस, एक्शन, इमोशन और कॉमेडी का मिश्रण है. हालांकि, धीमी रफ्तार और गैरजरूरी गानों की वजह से इसका असर कई जगह कम हो जाता है.
कुल मिलाकर, ‘हैवान’ कोई बेहतरीन मास्टरपीस नहीं है, लेकिन इसमें एक अच्छी कहानी और मजबूत कलाकारों का सहारा है. अगर आप थोड़ी सुस्ती को नजरअंदाज कर सकते हैं, तो इस फिल्म को एक बार देखा जा सकता है.