4 महीने में 22 मौत की सजा देने वाले जज कौन हैं रवि कुमार दिवाकर? फैसलों से क्यों मचा हड़कंप

Knews Desk- जस्टिस रवि कुमार दिवाकर एक बार फिर अपने फैसलों को लेकर चर्चा में हैं। मुजफ्फरनगर में एडीजे के पद पर रहते हुए उन्होंने करीब चार महीनों के दौरान 10 अलग-अलग मामलों में 22 दोषियों को मौत की सजा सुनाई है। इससे पहले बरेली में भी वह 13 दोषियों को मृत्युदंड दे चुके हैं। इस तरह 17 साल की न्यायिक सेवा में उनके द्वारा सुनाई गई मौत की सजाओं की संख्या 35 तक पहुंच गई है।

रवि कुमार दिवाकर वही न्यायिक अधिकारी हैं, जिनका नाम वर्ष 2022 में ज्ञानवापी परिसर के सर्वे के आदेश के बाद देशभर में चर्चा में आया था। अब लगातार सामने आ रहे मृत्युदंड के फैसलों ने उन्हें एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।

मुजफ्फरनगर में उनके कार्यकाल के दौरान मृत्युदंड का सिलसिला 6 अप्रैल से शुरू हुआ। इस दिन वकील समीर सैफी की हत्या के मामले में तीन दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई। इसके बाद एक ही परिवार के चार सदस्यों की हत्या के मामले में चार दोषियों को मृत्युदंड दिया गया। इस घटना में एक महिला और उसके तीन बेटों की हत्या की गई थी।

इसके बाद 30 मई को एक दोषी, 20 जून को दो दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई। जुलाई में भी यह सिलसिला जारी रहा। 2 जुलाई को एक, 6 जुलाई को दो और 17 जुलाई को चार दोषियों को मृत्युदंड दिया गया। अगस्त में 12 अगस्त को एक और 13 अगस्त को चार दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई।

किन मामलों में सुनाई गई मौत की सजा?

जस्टिस दिवाकर के सामने आए मामलों में कई बेहद गंभीर आपराधिक घटनाएं शामिल हैं। इनमें वर्ष 2020 में ड्यूटी के दौरान एक होमगार्ड की हत्या का मामला भी शामिल है। इसके अलावा 2011 में हाईवे पर डकैती के बाद हत्या से जुड़े मामले में भी चार दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई।

बरेली में तैनाती के दौरान भी उन्होंने कई चर्चित आपराधिक मामलों में कठोर फैसले दिए थे। वर्ष 2014 के ट्रिपल मर्डर और डकैती के मामले में चिमार हसन गैंग के आठ सदस्यों को उन्होंने मौत की सजा सुनाई थी।

‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ पर उठे सवाल

कम समय में इतनी बड़ी संख्या में मृत्युदंड के फैसले सामने आने के बाद न्यायिक स्तर पर ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ सिद्धांत को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कानून के तहत मौत की सजा केवल उन मामलों में दी जानी चाहिए जिन्हें दुर्लभतम से दुर्लभ श्रेणी में रखा जाता है।

ऐसे में लगातार आ रहे मृत्युदंड के फैसलों को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि इन मामलों में इस संवैधानिक और न्यायिक सिद्धांत को किस तरह लागू किया गया है। हालांकि, हर मामले में अंतिम निर्णय और उसकी न्यायिक समीक्षा अलग-अलग तथ्यों एवं परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

ज्ञानवापी सर्वे के आदेश से मिली राष्ट्रीय पहचान

जस्टिस रवि कुमार दिवाकर वर्ष 2022 में वाराणसी में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पद पर तैनात थे। इसी दौरान उन्होंने ज्ञानवापी परिसर के सर्वे का आदेश दिया था। यह आदेश पांच हिंदू महिलाओं की उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने परिसर में श्रृंगार गौरी की पूजा की अनुमति मांगी थी।

16 मई 2022 को हुए सर्वे के दौरान वुजूखाने में एक बेलनाकार आकृति मिलने की बात सामने आई थी। हिंदू पक्ष ने इसे शिवलिंग बताया था, जबकि मुस्लिम पक्ष ने इस दावे को खारिज करते हुए इसे शिवलिंग मानने से इनकार किया था। बाद में संबंधित क्षेत्र को सील कर दिया गया और सुप्रीम कोर्ट ने मामले को वाराणसी के जिला जज की अदालत में भेज दिया।

ज्ञानवापी आदेश के बाद मिली थी धमकी

ज्ञानवापी मामले में आदेश के बाद जस्टिस दिवाकर को कथित तौर पर धमकी भरा पत्र मिलने की बात सामने आई थी। उन्होंने पुलिस को इसकी जानकारी दी थी, जिसके बाद उनकी सुरक्षा की समीक्षा की गई।

रवि कुमार दिवाकर आजमगढ़, सुल्तानपुर, बदायूं, वाराणसी, बरेली और चित्रकूट समेत कई स्थानों पर न्यायिक सेवा दे चुके हैं। उन्होंने 29 नवंबर 2025 को मुजफ्फरनगर में पदभार संभाला था। वर्ष 2025 में चित्रकूट में तैनाती के दौरान भी उन्होंने ज्ञानवापी मामले से जुड़ी धमकियों का हवाला देते हुए अपनी आवासीय सुरक्षा बढ़ाने की मांग की थी।

लगातार कठोर फैसलों और ज्ञानवापी मामले में दिए गए आदेश के कारण जस्टिस रवि कुमार दिवाकर का नाम एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है।

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