Knews Desk- देश की न्यायिक व्यवस्था इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रही है। एक ओर हाईकोर्टों में बड़ी संख्या में जजों के पद खाली हैं, वहीं दूसरी ओर अदालतों में लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। राज्यसभा में सरकार द्वारा साझा किए गए ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि जजों की कमी का सीधा असर मामलों के निपटारे की रफ्तार पर पड़ रहा है।
केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संसद में बताया कि 1 जुलाई 2026 तक देश के 25 हाईकोर्टों में जजों के 1,122 स्वीकृत पद हैं। इनमें से केवल 781 पदों पर ही नियुक्ति है, जबकि 341 पद अभी भी खाली हैं। यानी हाईकोर्टों में करीब 30 प्रतिशत पद रिक्त हैं और लगभग हर तीसरा पद खाली पड़ा है।
सबसे अधिक रिक्तियां इलाहाबाद हाईकोर्ट में हैं, जहां 52 जजों के पद खाली हैं। इसके बाद कलकत्ता हाईकोर्ट में 31, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में 30, मद्रास हाईकोर्ट में 24 और बॉम्बे हाईकोर्ट में 19 पद रिक्त हैं। इन पांच हाईकोर्टों में ही देश के कुल खाली पदों का आधे से अधिक हिस्सा है।
नियुक्ति प्रक्रिया में कई संस्थाओं की भूमिका
सरकार के अनुसार, हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 217 और 224 के तहत की जाती है। इस प्रक्रिया में संबंधित हाईकोर्ट, राज्य सरकार, केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की भागीदारी होती है। मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (MoP) के अनुसार, किसी पद के खाली होने से कम से कम छह महीने पहले नए नाम भेजे जाने चाहिए, ताकि समय पर नियुक्ति हो सके। हालांकि व्यवहार में कई बार यह प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो पाती, जिससे पद लंबे समय तक रिक्त रहते हैं।
5.64 करोड़ से अधिक मामले लंबित
राज्यसभा में सरकार ने लंबित मामलों के आंकड़े भी पेश किए। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) के अनुसार, 16 जुलाई 2026 तक देश की सभी अदालतों में 5.64 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हैं।
इनमें:
- सुप्रीम कोर्ट – 96,024 मामले
- हाईकोर्ट – 64.72 लाख मामले
- जिला एवं अधीनस्थ अदालतें – लगभग 4.98 करोड़ मामले
हाईकोर्टों में सबसे अधिक 12.28 लाख मामले इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित हैं। इसके बाद राजस्थान हाईकोर्ट में 6.96 लाख, बॉम्बे हाईकोर्ट में 6.57 लाख और मद्रास हाईकोर्ट में 5.67 लाख मामले लंबित हैं। जिन हाईकोर्टों में मामलों का बोझ सबसे अधिक है, वहीं जजों की कमी भी गंभीर बनी हुई है।
वहीं जिला और अधीनस्थ अदालतों में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है, जहां 1.19 करोड़ मामले लंबित हैं। इसके बाद महाराष्ट्र में 61.80 लाख, पश्चिम बंगाल में 41.04 लाख और बिहार में 37.62 लाख मामले विचाराधीन हैं।
लंबित मामलों को कम करने के लिए सरकार की पहल
सरकार ने अदालतों में लंबित मामलों को कम करने के लिए कई कदम उठाने की जानकारी भी दी। ई-कोर्ट्स परियोजना के तीसरे चरण (2023-2027) के लिए 7,210 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई है। इसका उद्देश्य न्यायिक व्यवस्था को डिजिटल, पारदर्शी और अधिक सुलभ बनाना है।
इसके अलावा रेप और पॉक्सो मामलों के त्वरित निपटारे के लिए 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 775 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट संचालित किए जा रहे हैं। इनमें 398 विशेष पॉक्सो अदालतें शामिल हैं, जिन्होंने अब तक 3.87 लाख से अधिक मामलों का निपटारा किया है।
सरकार ने यह भी बताया कि सभी हाईकोर्टों और जिला अदालतों में पांच वर्ष से पुराने मामलों की समीक्षा और शीघ्र निपटारे के लिए एरियर कमेटियां गठित की गई हैं। साथ ही ई-कोर्ट्स, वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR), लोक अदालतों और नए आपराधिक कानूनों के माध्यम से न्यायिक प्रक्रिया को तेज करने की कोशिश की जा रही है।
न्यायपालिका पर ही निर्भर है अंतिम फैसला
कानून मंत्री ने स्पष्ट किया कि किसी भी मामले का अंतिम निपटारा न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। मामलों में देरी के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जिनमें कानूनी जटिलता, साक्ष्यों की उपलब्धता, गवाहों की उपस्थिति, जांच एजेंसियों और पक्षकारों का सहयोग शामिल है।
सरकार के ताजा आंकड़े यह संकेत देते हैं कि देश में न्यायिक व्यवस्था पर बढ़ते बोझ को कम करने के लिए केवल तकनीकी सुधार पर्याप्त नहीं होंगे। हाईकोर्टों में खाली पड़े जजों के पदों को समय पर भरना भी उतना ही जरूरी है, ताकि लंबित मामलों का तेजी से निपटारा हो सके।