सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: गृहिणियों के काम की कीमत कम से कम ₹30,000 महीना, कहा- वे हैं ‘राष्ट्र निर्माता’

KNEWS DESK- गृहिणियों के योगदान को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि घर संभालने वाली महिलाओं के घरेलू कार्यों की आर्थिक कीमत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सड़क दुर्घटना मुआवजा मामलों में अब गृहिणियों के काम का न्यूनतम मूल्यांकन 30,000 रुपये प्रति माह माना जाएगा।

यह फैसला ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण साबित होगा, जहां किसी सड़क दुर्घटना में गृहिणी की मृत्यु हो जाती है। अब उनके परिवार को मिलने वाले मुआवजे की गणना शून्य आय के आधार पर नहीं, बल्कि कम से कम 30,000 रुपये मासिक आय के आधार पर की जाएगी।

20 साल पुराने मामले में आया फैसला

यह मामला पंजाब की रहने वाली रेशमा नामक महिला से जुड़ा है, जिनकी वर्ष 2001 में एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। उनके पति और तीन बच्चों ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) में मुआवजे की मांग की थी। हालांकि न्याय पाने की प्रक्रिया लंबी चली और मामला विभिन्न अदालतों से गुजरते हुए अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।

गृहिणियों के योगदान को मिला सम्मान

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि गृहिणियों के काम की तुलना किसी कुशल या अकुशल मजदूर की मजदूरी से नहीं की जा सकती। घर की देखभाल, बच्चों का पालन-पोषण और परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करना ऐसा योगदान है जिसकी सामाजिक और आर्थिक अहमियत बेहद बड़ी है।

अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि गृहिणियों को केवल ‘हाउसवाइफ’ नहीं बल्कि ‘राष्ट्र निर्माता’ के रूप में देखा जाना चाहिए, क्योंकि वे परिवार और समाज की नींव को मजबूत बनाती हैं।

मुआवजा तय करने का नया आधार

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि घरेलू देखभाल और पारिवारिक योगदान के नुकसान का मूल्यांकन कम से कम 30,000 रुपये प्रतिमाह के आधार पर किया जाएगा। यह राशि अन्य कानूनी मुआवजा प्रावधानों के अतिरिक्त होगी और भविष्य के मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल बनेगी।

लंबित मामलों पर भी जताई चिंता

सुनवाई के दौरान अदालत ने सड़क दुर्घटना मुआवजा मामलों के निपटारे में होने वाली देरी पर भी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि पीड़ित परिवारों को वर्षों तक न्याय के लिए इंतजार नहीं करना चाहिए। अदालत ने देशभर के हाई कोर्टों से ऐसे मामलों की निगरानी करने और एक वर्ष के भीतर उनका निपटारा सुनिश्चित करने का आग्रह किया है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल गृहिणियों के श्रम को सम्मान देने वाला है, बल्कि समाज में महिलाओं के अदृश्य योगदान को आर्थिक और कानूनी मान्यता देने की दिशा में एक बड़ा कदम भी माना जा रहा है।

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