डिजिटल डेस्क- अदालत से बड़ा कानूनी झटका लगा है। मतगणना पर्यवेक्षकों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली टीएमसी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव आयोग (EC) को अपने अधिकारियों के चयन और नियुक्ति का पूर्ण संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल की दलीलें
टीएमसी की ओर से पैरवी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा किया और मुख्य रूप से चार अहम बिंदु रखे। उन्होंने सबसे पहले देरी से जानकारी दिए जाने का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) को नोटिस 13 अप्रैल को ही जारी हो गया था, लेकिन इसकी सूचना उन्हें 29 अप्रैल को दी गई, जो प्रक्रियात्मक रूप से गलत है। इसके साथ ही उन्होंने गड़बड़ी की आशंका के आधार पर सवाल उठाते हुए कहा कि आयोग का हर बूथ पर गड़बड़ी का दावा करना चौंकाने वाला है और यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें ऐसी जानकारी कहाँ से मिली। सिब्बल ने अतिरिक्त पर्यवेक्षकों की जरूरत पर तर्क दिया कि जब पहले से ही हर जगह केंद्रीय ‘माइक्रो ऑब्जर्वर’ मौजूद हैं, तो एक और अतिरिक्त केंद्रीय अधिकारी की नियुक्ति का कोई ठोस औचित्य समझ नहीं आता। अंत में, उन्होंने राज्य अधिकारियों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए कहा कि आयोग के खुद के परिपत्र में राज्य सरकार के अधिकारी की मौजूदगी की बात कही गई है, फिर भी राज्य द्वारा नामित किसी अधिकारी को नियुक्त न करना नियमों के खिलाफ है।
‘आशंकाओं का आधार बताए आयोग’
कपिल सिब्बल ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के उस बयान पर भी सवाल उठाए जिसमें संभावित अनियमितताओं की आशंका जताई गई थी। उन्होंने कहा कि यह सीधे तौर पर राज्य सरकार की कार्यक्षमता पर निशाना साधने जैसा है। सिब्बल ने जोर देकर कहा कि आयोग को कुछ आंकड़े या ठोस सबूत पेश करने चाहिए कि आखिर प्रत्येक बूथ पर गड़बड़ी की आशंका का पता उन्हें कैसे चला और उन्होंने केंद्र सरकार के उम्मीदवारों की नियुक्ति का खुलासा पहले क्यों नहीं किया। सुनवाई के दौरान जब सिब्बल ने राजनीतिक दलों को विश्वास में न लेने की बात कही, तो जस्टिस बागची ने अहम टिप्पणी की। उन्होंने सवाल किया कि अधिकारियों की नियुक्ति के मामले में राजनीतिक दलों से सहमति लेने का सवाल ही कहाँ उठता है? कोर्ट ने माना कि चुनाव की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए अधिकारियों की तैनाती चुनाव आयोग का विशेषाधिकार है।
नतीजों पर असर की संभावना
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस फैसले को काफी अहम माना जा रहा है। टीएमसी लगातार यह आरोप लगाती रही है कि केंद्रीय एजेंसियों और केंद्रीय अधिकारियों के जरिए चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद अब साफ है कि मतगणना की प्रक्रिया चुनाव आयोग द्वारा तय किए गए पर्यवेक्षकों की निगरानी में ही संपन्न होगी। इस झटके के बाद टीएमसी को अब आयोग के तय मानकों के अनुसार ही मतगणना प्रक्रिया में शामिल होना होगा।