चुनाव से पहले बाँटीं जा रहीं रेवड़ियाँ ,जानिये क्या है रेवड़ी कल्चर

KNEWS DESK…भारत में अगले साल से चुनाव होने वाले है।चुनाव आते ही वोटर्स को लुभाने का सिलसिला शुरू हो जाता है । इससे नया शब्द चर्चा में आ गया जिसे रेवड़ी कल्चर नाम दिया गया है। पीएम मोदी  भी कई बार रेवड़ी कल्चर का जिक्र कर चुके हैं ।और इसे देश के लिए नुकसानदायक परंपरा भी बता चुके हैं ।रेवड़ी कल्चर को रोकने के लिए न्यायालय में एक जनहित याचिका भी दायर की गई। आइये जानें रेवड़ी कल्चर के बारे में —-

क्या है पूरा मामला ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस ‘रेवड़ी कल्चर’ को बंद करने की बात कर रहे हैं। इसके बाद इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है। इसी बीच उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त वाली इन घोषणाओं और वायदों पर रोक लगाने की मांग की गयी है। याचिका में कहा गया है कि केंद्र सरकार और चुनाव आयोग राजनीतिक पार्टियों के चुनावी घोषणापत्र को नियंत्रित करने और उनके वादों के लिए उन्हें ज़िम्मेदार ठहराने से जुड़ा क़ानून लाए और बिना सोच-समझकर अतार्किक वादे करने वाली पार्टियों को बैन करे। याचिकाकर्ता का आगे कहना है कि मुफ़्त चीज़ों की घोषणा करते वक़्त राजनीतिक पार्टियां सरकार पर पड़ रहे कर्ज़ के बोझ का ध्यान रखें और बताएं कि इसके लिए पैसा किसकी जेब से आ रहा है।

इस याचिका पर तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके ने भी कोर्ट में एक याचिका दायर की है और इसमें फ्रीबीज़ की परिभाषा को ही चुनौती दी गई है। डीएमके ने तर्क दिया है कि वंचितों के लिए शुरु किए गए स्कीम को फ्रीबी नहीं कहा जा सकता। ऐसे में ये कैसे तय होगा कि कौन सी मुफ्त योजना अच्छी वाली है और कौन सी खराब।

क्या है रेवड़ी कल्चर ?

चुनावों में मतदाताओं को रिझाने के लिए राजनीति दलों की ओर से की जाने वालीं लुभावनी घोषणाओं को ‘रेवड़ी कल्चर’ का नाम दिया गया है। पिछले महीने जुलाई में प्रधानमंत्री मोदी ने इसे ‘रेवड़ी कल्चर’ का नाम दिया था। तब से मीडिया में यह शब्द पापुलराइज हो गया।

चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट का बयान

चुनाव आयोग ने कहा था कि चुनाव से पहले या बाद में मुफ्त उपहार देना राजनीतिक दलों का नीतिगत फैसला है। वह राज्य की नीतियों और पार्टियों की ओर से लिए गए फैसलों को नियंत्रित नहीं कर सकता। आयोग ने कहा कि इस तरह की नीतियों का क्या नकारात्मक असर होता है? ये आर्थिक रूप से व्यवहारिक हैं या नहीं? जिसे आप सामान्य भाषा में ‘फ्रीबीज़’ यानी मुफ़्त की चीज़ें कह रहे हैं, वे महामारी जैसे दौर में लोगों की जान बचा सकती हैं। हो सकता है एक वर्ग के लिए जो अतार्किक हो वो दूसरे वर्ग के लिए ज़रूरी हो। ये सब कुछ फैसला करना मतदाताओं का काम है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर गंभीर चिंता जाहिर करते हुए इसे पुनर्विचार के लिए तीन जजों की बेंच को ट्रांसफर कर दिया है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मसले पर विशेषज्ञ कमिटी का गठन करना सही होगा। लेकिन उससे पहले कई सवालों पर विचार करना जरूरी है जैसे कि 2013 के सुब्रमण्यम बालाजी फैसले की समीक्षा किया जाना चाहिए। खैर …. सुनवाई के लिए अगली तारीख तय कर दी गई है।

क्या मुफ़्त में चीजें या सेवाएं देना उचित है?

एक ऐसा समाज जहां आर्थिक और सामाजिक समेत तमाम तरह की विषमताएं हैं। वहां सभी के लिए एक जैसा कदम नहीं उठाया जा सकता। ऐसे में वंचितों और शोषितों का कल्याण करना हर सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। क्योंकि अगर ऐसी योजनाएं नहीं होंगी तो वेलफेयर स्टेट के विचार को ही चुनौती मिलेगी। आख़िरकार भारत एक कल्याणकारी राज्य जो है।

यह उद्योगों को बढ़ावा दे सकता है जैसे कि अगर किसी जरूरतमंद को सरकार ई-रिक्शा उपलब्ध करा दे तो वह अपनी आजीविका बेहतर बना सकता है। जो कम विकसित राज्य हैं उनके लिए यह काफी मददगार साबित हो सकता है। इसके अलावा जैसे-जैसे समय बीत रहा है लोगों की सरकार से अपेक्षाएं बढ़ती जा रही हैं। ऐसे में अगर सरकार उन्हें कुछ सुविधापूर्ण चीजें मुफ्त उपलब्ध करा रही है तो यह लोगों की अपेक्षाओं की पूर्ति ही है।

लेकिन लोकतंत्र में अगर आपका काम बहुसंख्यक समाज को लाभान्वित नहीं करेगा तो आप चुनकर नहीं आ सकते। इसलिए जब कोई राजनेता वोट मांगने जाता है तो उसे इस तरह की मुफ्तखोरी वाली बातें तो कहनी ही होती हैं। ये प्रवृत्ति किसी एक दल की नहीं है, बल्कि सभी दलों की होती है। इस चक्कर में मुफ्त चीजें बांटने की होड़ शुरू हो जाती है।

ज्यादा से ज्यादा वोट के चक्कर में राजनीतिक पार्टियां अनावश्यक व्यय शुरू कर देती हैं। यह कोई नहीं सोचता कि इस तरह के मुफ्त उपहार भविष्य में आर्थिक आपदा के कारण बन सकते हैं। लोगों में मुफ्तखोरी की आदत विकसित होती है जो विकास जैसे मुद्दों की राजनीति कमजोर कर सकती है। लालच के कारण मतदाता भी चुनाव के समय निष्पक्ष तरीके से चुनने के अपने अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकते हैं। मुफ्त की बिजली दी जाएगी; मुफ्त के इलेक्ट्रॉनिक सामान बांटे जाएंगे …. तो फिर उसका इस्तेमाल भी उसी तरह से किया जाएगा जो आगे चलकर पर्यावरण के लिहाज से भी अच्छा नहीं होगा। ‘क्रेडिट कल्चर’ ही पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। उदाहरण के तौर पर जब सरकार लोन माफ कर देने वाली एक संस्कृति विकसित कर देगी तो लोग लोन को वापस क्यों करना चाहेंगे।

 

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