अवैध ‘टैक्स’ के जाल में फंसा मणिपुर, उगाही और ड्रग्स के धंधे ने तबाह की आम लोगों की जिंदगी

KNEWS DESK – मणिपुर की पहचान लंबे समय से जातीय हिंसा और राजनीतिक तनाव वाले राज्य के रूप में रही है। लेकिन इस संघर्ष का एक ऐसा पक्ष भी है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है, इसकी आर्थिक कीमत। हिंसा का सबसे बड़ा बोझ आम नागरिक उठा रहा है, जो रोजमर्रा की जरूरतों पर भी एक तरह का ‘हिडन टैक्स’ चुकाने को मजबूर है।

हर जरूरी चीज पर ‘छिपा हुआ टैक्स’

इंफाल, कांगपोकपी और आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए पेट्रोल, एलपीजी सिलेंडर, दवाइयां, स्कूल फीस और यहां तक कि सरकारी कर्मचारियों की सैलरी भी जबरन वसूली के दायरे से बाहर नहीं है। यह टैक्स सरकार नहीं, बल्कि उग्रवादी संगठनों, आपराधिक गिरोहों और ड्रग्स नेटवर्क से जुड़े समूहों द्वारा वसूला जाता है। इन संगठनों ने समानांतर गैर-कानूनी अर्थव्यवस्था खड़ी कर दी है।

ड्रग्स नेटवर्क बना आर्थिक ताकत

मणिपुर ‘गोल्डन ट्राएंगल’ के पश्चिमी छोर पर स्थित है। पिछले कुछ वर्षों में यह केवल म्यांमार से आने वाली हेरोइन का ट्रांजिट रूट नहीं रहा, बल्कि अवैध अफीम उत्पादन का भी केंद्र बन गया है। राज्य सरकार के ‘वॉर ऑन ड्रग्स’ अभियान के बावजूद हजारों एकड़ में अफीम की खेती लगातार सामने आ रही है।

सिर्फ नवंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच 2,618 एकड़ अवैध अफीम की खेती नष्ट की गई। वहीं जुलाई 2022 से जुलाई 2023 के बीच करीब 1,500 करोड़ रुपये की अवैध ड्रग्स जब्त की गई। जांच एजेंसियों के अनुसार, ड्रग्स कारोबार से होने वाली कमाई का इस्तेमाल हथियार खरीदने और नए लोगों की भर्ती में भी किया जाता है।

जबरन वसूली का संगठित नेटवर्क

ड्रग्स के साथ-साथ जबरन उगाही भी मणिपुर की सबसे बड़ी आर्थिक समस्या बन चुकी है। राज्य के प्रमुख हाईवे पर कई गैर-कानूनी चेकपॉइंट सक्रिय हैं, जहां ट्रांसपोर्टरों से हर ट्रिप पर वसूली की जाती है। सरकारी कर्मचारियों से भी उनकी सैलरी का एक हिस्सा “टैक्स” के नाम पर वसूला जाता है।

स्कूल, कॉलेज, व्यापारी, फार्मेसी, ईंट-भट्टे और सरकारी ठेकेदार भी इस नेटवर्क की गिरफ्त में हैं। जांच एजेंसियों ने ऐसे मामलों का खुलासा किया है, जहां विकास परियोजनाओं के लिए जारी धन भी उग्रवादी नेटवर्क तक पहुंच गया।

महंगाई की सबसे बड़ी मार

इस गैर-कानूनी व्यवस्था का असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ता है। कई बार नाकेबंदी के दौरान पेट्रोल की कीमत 250 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच चुकी है। वहीं करीब 1,000 रुपये का घरेलू एलपीजी सिलेंडर 5,000 रुपये तक बिकने की घटनाएं सामने आई हैं। दवाइयों और जरूरी सामान की सप्लाई भी गंभीर रूप से प्रभावित होती है।

आर्थिक विकास में पिछड़ता मणिपुर

लगातार हिंसा और अस्थिरता का असर राज्य की अर्थव्यवस्था पर भी साफ दिखाई देता है। मणिपुर की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। वहीं पड़ोसी मिजोरम, जहां वर्षों पहले शांति स्थापित हो चुकी है, प्रति व्यक्ति आय और मानव विकास सूचकांक (HDI) दोनों में कहीं आगे निकल चुका है। असम भी तेज आर्थिक वृद्धि दर्ज कर रहा है, जबकि मणिपुर अब भी सरकारी खर्च और सहायता पर काफी हद तक निर्भर है।

सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

विशेषज्ञों का मानना है कि मणिपुर में केवल हिंसा रोकना पर्याप्त नहीं होगा। जब तक ड्रग्स नेटवर्क, जबरन वसूली और इनके आर्थिक तंत्र को खत्म नहीं किया जाता, तब तक स्थायी शांति और विकास संभव नहीं है। अफीम की खेती पर प्रभावी रोक, अवैध संपत्तियों की जब्ती, सुरक्षित परिवहन और वित्तीय नेटवर्क पर कार्रवाई ही इस समानांतर अर्थव्यवस्था को कमजोर कर सकती है।

मणिपुर की असली लड़ाई केवल बंदूकें शांत कराने की नहीं, बल्कि उस गैर-कानूनी आर्थिक तंत्र को खत्म करने की है जिसने आम नागरिक के जीवन और राज्य के विकास दोनों को बंधक बना रखा है।

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