Knews Desk- कर्नाटक हाई कोर्ट ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण बढ़ाने वाले 2022 के कानून के प्रावधानों को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक करना संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने सोमवार, 12 अक्टूबर को राज्य में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए बढ़ाए गए आरक्षण से जुड़े कानून के प्रावधानों को रद्द कर दिया। मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और न्यायमूर्ति केएस हेमलेखा की पीठ ने यह फैसला सुनाया। राज्य सरकार ने 2022 के कानून के तहत SC का आरक्षण 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और ST का आरक्षण 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत किया था। इससे राज्य में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से बढ़कर 56 प्रतिशत हो गया था।
हाई कोर्ट ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में सीटों के आरक्षण से संबंधित कानून की धारा 3, जहां तक वह कुल आरक्षण को 50 प्रतिशत से अधिक करती है, संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करती है। वहीं, सरकारी सेवाओं में नियुक्तियों और पदों के आरक्षण से संबंधित धारा 4 को भी संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के विपरीत बताते हुए रद्द कर दिया गया।
यह फैसला कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली दो याचिकाओं पर आया है। आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा का उल्लेख सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के इंद्रा साहनी मामले में किया था।
यह कानून तत्कालीन मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के कार्यकाल में पारित हुआ था। इसे 11 जनवरी 2023 को राज्यपाल की मंजूरी मिली थी और अगले दिन राजपत्र में प्रकाशित किया गया था।
फैसले के बाद उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने संकेत दिए कि राज्य सरकार कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेकर सुप्रीम कोर्ट जाने पर विचार कर सकती है। उन्होंने कहा कि इस फैसले का सामाजिक न्याय, शिक्षा और रोजगार पर असर पड़ सकता है।