KNEWS DESK– ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान रूस और ईरान ने अमेरिका समेत पश्चिमी देशों की प्रतिबंधात्मक नीतियों और सैन्य कार्रवाइयों की आलोचना की। दोनों देशों ने ब्रिक्स से ऐसी रणनीतियां तैयार करने की अपील की, जिससे समूह बाहरी दबावों और चुनौतियों का बेहतर तरीके से सामना कर सके। ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि ब्रिक्स मंच पश्चिमी-विरोधी गठजोड़ में तब्दील न हो।
ईरान ने प्रतिबंधों को बताया खतरनाक
ब्रिक्स बिजनेस फोरम में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में ईरान पर कई प्रतिबंध लगाए गए हैं। हाल के महीनों में अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों के कारण यह दबाव और गंभीर हो गया है।
उन्होंने कहा कि इन कार्रवाइयों से भौतिक नुकसान के साथ यह भी स्पष्ट हुआ है कि आर्थिक सुरक्षा को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सुरक्षा से अलग नहीं किया जा सकता। किसी देश के व्यापार, ऊर्जा ढांचे या वित्तीय व्यवस्था पर दबाव का असर उसकी सीमाओं से बाहर तक पहुंच सकता है।
पुतिन ने लगाए गंभीर आरोप
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने उन नेताओं की आलोचना की, जो अपना पुराना वैश्विक दबदबा वापस हासिल करने के लिए हर संभव तरीका अपना रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके लिए सैन्य बल, औद्योगिक और लॉजिस्टिक ढांचे को नुकसान पहुंचाने, अंतरराष्ट्रीय परिवहन गलियारों को रोकने और समुद्री जहाजों पर कब्जे जैसी कार्रवाइयां की जा रही हैं।
पुतिन ने यह भी कहा कि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने वाले देशों पर तथाकथित दूसरे दर्जे के प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं।
भारत को साधना होगा संतुलन
रूस और ईरान के बयानों से भारत के सामने मौजूद कूटनीतिक चुनौती साफ हो गई है। भारत को अपनी फ्लेक्सिबल मल्टी-अलाइनमेंट नीति के तहत सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखते हुए ब्रिक्स को किसी एक धड़े का मंच बनने से रोकना होगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ब्रिक्स के प्रति अपना विरोध पहले ही जाहिर कर चुके हैं। वहीं, चीन डी-डॉलरलाइजेशन और वैकल्पिक सीमा-पार भुगतान प्रणालियों को बढ़ावा देने में रुचि दिखा रहा है, जो पश्चिमी नियंत्रण वाले SWIFT सिस्टम को चुनौती दे सकती हैं। ऐसे में ब्रिक्स की चर्चाओं पर अमेरिकी प्रशासन की नजर बनी रहना तय माना जा रहा है।