Knews Desk- भारत में चीनी की कीमतों में अचानक हुई बढ़ोतरी ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। इसी के साथ पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग यानी E20 नीति को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। सवाल यह है कि क्या एथेनॉल बनाने के लिए गन्ने और चीनी के इस्तेमाल के कारण घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता कम हुई और कीमतें बढ़ गईं? केंद्र सरकार ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा है कि चीनी की महंगाई के लिए एथेनॉल उत्पादन को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है।
20 अगस्त को देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत बढ़कर करीब 55.70 रुपये प्रति किलो हो गई। इसके मुकाबले 20 जुलाई को यही कीमत करीब 48.18 रुपये प्रति किलो थी। यानी एक महीने के भीतर चीनी के दाम में लगभग 7.52 रुपये प्रति किलो, यानी करीब 15.6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के मुताबिक, 2022-23 सीजन में एथेनॉल उत्पादन के लिए करीब 12 फीसदी चीनी डायवर्ट की गई थी। वहीं 2025-26 सीजन में यह हिस्सा घटकर लगभग 9 फीसदी रह गया है।
सरकार का कहना है कि अगर एथेनॉल उत्पादन चीनी की कमी और महंगाई की बड़ी वजह होता, तो चीनी का डायवर्जन बढ़ना चाहिए था। इसके उलट इसमें कमी आई है। साथ ही, देश में बनने वाले कुल एथेनॉल का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्का, से तैयार किया जा रहा है।
चीनी उत्पादन में आई बड़ी गिरावट
सरकार के अनुसार चीनी की कीमत बढ़ने की प्रमुख वजह घरेलू उत्पादन में अनुमान से ज्यादा कमी है। पहले 2025-26 सीजन में गन्ना उत्पादक राज्यों से करीब 3.43 करोड़ टन चीनी उत्पादन का अनुमान लगाया गया था। अब यह अनुमान घटकर लगभग 3.06 करोड़ टन रह गया है।
यानी शुरुआती अनुमान के मुकाबले उत्पादन में करीब 37 लाख टन की कमी आने की आशंका है।
बीमारी और बारिश ने बिगाड़ा गन्ने का उत्पादन
गन्ने की फसल पर कई बीमारियों और मौसम की मार का असर पड़ा है। सरकार के मुताबिक रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों से गन्ने की पैदावार प्रभावित हुई। इसके अलावा कई इलाकों में भारी बारिश और जलभराव ने भी फसल को नुकसान पहुंचाया।
त्योहारों से पहले बढ़ी मांग
त्योहारी सीजन करीब आने के साथ चीनी की मांग में भी इजाफा हो रहा है। ऐसे में कम उत्पादन और बढ़ती मांग के बीच बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ गया है।
सरकार को आशंका है कि कुछ कारोबारी चीनी का स्टॉक रोककर कीमतों को बढ़ाने की कोशिश कर सकते हैं। इसी वजह से सरकार ने बाजार में उपलब्ध स्टॉक पर निगरानी बढ़ा दी है।
चीनी के स्टॉक पर सरकार की सख्ती
केंद्र ने चीनी डीलरों के लिए 400 टन की स्टॉक लिमिट निर्धारित की है। यह व्यवस्था 30 नवंबर 2026 तक लागू रहेगी। वहीं 1 सितंबर से बड़े उपभोक्ताओं को अपनी 15 दिन की जरूरत से अधिक चीनी रखने की अनुमति नहीं होगी।
सरकार और राज्यों की संयुक्त टीमें चीनी मिलों में उपलब्ध स्टॉक की भी जांच करेंगी, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं जानबूझकर चीनी की सप्लाई रोककर कीमतें तो नहीं बढ़ाई जा रहीं।
10 लाख टन कच्ची चीनी का आयात
घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ाने के लिए सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात को मंजूरी दी है। सरकार का लक्ष्य है कि इससे बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़े और कीमतों पर दबाव कम हो।
सरकार का कहना है कि मौजूदा स्टॉक अक्टूबर में शुरू होने वाले नए पेराई सीजन तक घरेलू मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त है। राज्यों और चीनी मिलों को 15 अक्टूबर से पेराई शुरू करने की सलाह दी गई है।
सरकार को उम्मीद है कि अक्टूबर में चीनी उत्पादन 10 लाख टन से अधिक रह सकता है।
असली सवाल क्या है?
सरकार ने साफ किया है कि चीनी की मौजूदा महंगाई का सीधा संबंध E20 या एथेनॉल ब्लेंडिंग से नहीं है। लेकिन उत्पादन में गिरावट, त्योहारी मांग, घटता बफर स्टॉक और संभावित जमाखोरी ने चीनी की कीमतों पर दबाव जरूर बढ़ाया है।
ऐसे में आने वाले त्योहारी सीजन में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती चीनी की पर्याप्त सप्लाई बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रित करने की होगी।