अहोई अष्टमी पर व्रत कथा पढ़ने और सुनने की है विशेष परंपरा। जानें साहूकार की बहू और स्याऊ माता से जुड़ी पौराणिक कथा, जिसका संबंध संतान की लंबी उम्र और सुखी जीवन की कामना से है।
KNEWS DESK- कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर अहोई अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के साथ व्रत रखती हैं। साल 2026 में अहोई अष्टमी का व्रत रविवार, 1 नवंबर को रखा जा रहा है। इस अवसर पर अहोई माता की पूजा-अर्चना करने के साथ व्रत कथा पढ़ने और सुनने का विशेष महत्व माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई माता की आराधना करने से संतान के जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इस दिन महिलाएं पूरे विधि-विधान से पूजा करती हैं और शाम को तारों को अर्घ्य देने के बाद अपनी परंपरा के अनुसार व्रत का पारण करती हैं। अहोई अष्टमी से जुड़ी पौराणिक कथा में एक साहूकार की बहू, स्याऊ माता और संतान सुख की प्राप्ति का प्रसंग मिलता है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक यह कथा सुनने और माता की पूजा करने से संतान पर उनका आशीर्वाद बना रहता है।
अहोई अष्टमी की पौराणिक व्रत कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन समय में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे, सात बहुएं और एक बेटी थी। एक बार दीपावली से पहले घर की लिपाई-पुताई के लिए मिट्टी लाने उसकी बेटी अपनी भाभियों के साथ जंगल गई। यह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि थी।
जंगल में मिट्टी खोदते समय साहूकार की बेटी की खुरपी से अनजाने में स्याऊ यानी साही के एक बच्चे को चोट लग गई, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। अपने बच्चे को मृत देखकर स्याऊ माता क्रोधित हो गईं। उन्होंने साहूकार की बेटी को श्राप दिया कि जिस तरह उसने उनके बच्चे की जान ली है, उसी तरह उसकी कोख भी बांध दी जाएगी।
स्याऊ माता के श्राप से भयभीत साहूकार की बेटी ने अपनी भाभियों से विनती की कि वे उसकी जगह अपनी कोख बंधवा लें। लेकिन सभी भाभियों ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। आखिरकार सबसे छोटी बहू अपनी ननद की जगह श्राप स्वीकार करने के लिए तैयार हो गई।
कथा के अनुसार, स्याऊ माता के श्राप का प्रभाव छोटी बहू पर पड़ा। जब भी उसे संतान होती, वह सात दिन के भीतर ही चल बसती। बार-बार संतान को खोने के कारण बहू बेहद दुखी रहने लगी। अपनी परेशानी का समाधान खोजने के लिए उसने एक सिद्ध महात्मा और गांव की एक वृद्धा से सलाह ली। उन्होंने उसे स्याऊ माता की शरण में जाने, उनकी सेवा करने और सच्चे मन से प्रार्थना करने की सलाह दी।
स्याऊ माता की तलाश में निकली साहूकार की बहू
सलाह मिलने के बाद साहूकार की बहू स्याऊ माता को खोजने के लिए सात समुद्र पार निकल पड़ी। रास्ते में उसने एक पेड़ के नीचे सांप को गरुड़पंखनी के बच्चों पर हमला करते देखा। बहू ने साहस दिखाते हुए सांप को मार दिया और उन बच्चों की जान बचा ली। कुछ समय बाद गरुड़पंखनी वापस लौटी तो अपने बच्चों को सुरक्षित देखकर प्रसन्न हुई। बहू के इस उपकार से प्रभावित होकर उसने उसे अपनी पीठ पर बैठाया और सात समुद्र पार स्याऊ माता के पास पहुंचा दिया।
कथा में आगे बताया जाता है कि सुरही गाय की सलाह पर साहूकार की बहू ने स्याऊ माता की सेवा की। उसने सिलाई की सहायता से माता के सिर से जूं निकाली। बहू की सेवा और समर्पण से प्रसन्न होकर स्याऊ माता ने उसे आशीर्वाद दिया कि उसे सात बेटे और सात बहुएं प्राप्त होंगी। यह सुनकर बहू भावुक हो गई। उसने स्याऊ माता को अपनी पीड़ा बताते हुए कहा कि उनके श्राप के कारण उसकी संतान जीवित नहीं रह पाती और उसकी कोख बंधी हुई है।
बहू की बात सुनकर स्याऊ माता को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने उसे श्राप से मुक्त कर दिया और संतान सुख का आशीर्वाद दिया। इसके बाद जब साहूकार की बहू अपने घर लौटी तो उसने देखा कि उसके सात बेटे और सात बहुएं हैं। यह देखकर उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
अहोई माता की पूजा और उद्यापन की परंपरा
कथा के अनुसार, संतान सुख प्राप्त होने की खुशी में साहूकार की बहू ने अहोई माता का उजमन यानी उद्यापन किया। उसने सात अहोई बनाईं और सात कढ़ाही चढ़ाकर विधि-विधान से पूजा की। इसी पौराणिक प्रसंग के आधार पर अहोई अष्टमी पर संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाली के लिए व्रत रखने की परंपरा प्रचलित है। इस दिन माताएं अहोई माता का चित्र स्थापित करके पूजा करती हैं और व्रत कथा सुनती हैं। शाम को तारे दिखाई देने पर उन्हें अर्घ्य देकर संतान के सुखी जीवन की कामना की जाती है।
धार्मिक मान्यताओं में अहोई अष्टमी का व्रत मातृत्व, त्याग और संतान के प्रति प्रेम का प्रतीक माना जाता है। इस दिन श्रद्धा के साथ अहोई माता की पूजा और व्रत कथा का पाठ किया जाता है, ताकि परिवार में सुख-शांति बनी रहे और संतान के जीवन में खुशहाली आए।