अयोध्या में दसवें दीपोत्सव की भव्य तैयारी, 56 घाटों पर सजेंगे दीये, 30 लाख दीप जलाने का लक्ष्य

Knews Desk- अयोध्या का दीपोत्सव केवल दीयों की संख्या और विश्व रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भगवान राम की नगरी की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा को भी दर्शाता है। वरिष्ठ पत्रकार हरि शंकर मिश्र के अनुसार, रामकथा में अयोध्या को ऐसे नगर के रूप में वर्णित किया गया है, जहां प्रजा निश्चिंत रहती है, क्योंकि शासन अपनी जिम्मेदारी समझता है। इसी विचार के आधार पर दीपोत्सव की तैयारियों को सुशासन, अनुशासन और जनभागीदारी से जोड़कर देखा जा रहा है।

वर्ष 2017 में आयोजित पहले दीपोत्सव में 51 हजार दीये जलाए गए थे। इसके बाद हर साल दीयों की संख्या बढ़ती गई और आयोजन ने विश्व स्तर पर पहचान बनाई। इस बार 30 लाख दीप जलाने का लक्ष्य है। पहले दीयों की व्यवस्था 55 घाटों तक सीमित थी, लेकिन इस बार 56 घाटों पर दीये सजाए जाएंगे। दीयों को व्यवस्थित पंक्तियों में रखने के लिए ब्लॉक आधारित लेआउट तैयार किया जा रहा है। घाटों पर मार्किंग का काम तीन से चार दिनों में पूरा करने का लक्ष्य है।आयोजन की तैयारियों में किसी तरह की कमी न रहे, इसके लिए लक्ष्य से अधिक 33 लाख दीये मंगाए गए हैं। परिवहन के दौरान दीयों के टूटने की आशंका को देखते हुए अतिरिक्त व्यवस्था की गई है। यह कदम आयोजन को समय पर और व्यवस्थित तरीके से पूरा करने की योजना का हिस्सा है।

दीपोत्सव में समाज की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए 30 डिग्री कॉलेजों, 40 इंटरमीडिएट कॉलेजों और विश्वविद्यालय परिसर से लगभग 35 हजार स्वयंसेवकों को तैनात किया जाएगा। स्वयंसेवकों को घाटों के अनुसार जिम्मेदारियां सौंपी जाएंगी। उन्हें प्रशिक्षण देने के साथ पहचान पत्र भी उपलब्ध कराए जाएंगे। विश्वविद्यालय और जिला प्रशासन मिलकर दीयों की व्यवस्था, घाट प्रबंधन, स्वयंसेवकों की तैनाती और सुरक्षा मानकों पर काम कर रहे हैं।दीपोत्सव का आध्यात्मिक महत्व भगवान राम के 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की स्मृति से जुड़ा है। मान्यता है कि उनके आगमन पर नगरवासियों ने घर-घर दीप जलाकर खुशी मनाई थी। आज भी यह उत्सव अंधकार पर प्रकाश, अन्याय पर न्याय और निराशा पर आशा की विजय का संदेश देता है। रामलला के भव्य मंदिर में विराजमान होने के बाद अयोध्या की यह परंपरा और अधिक विशेष हो गई है।

इस आयोजन का स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ता है। मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों, तेल-बाती के कारोबारियों, परिवहन से जुड़े श्रमिकों, होटल संचालकों और स्थानीय दुकानदारों को इससे रोजगार और आय के अवसर मिलते हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों के पहुंचने से स्थानीय व्यवसायों को भी बढ़ावा मिलता है।हरि शंकर मिश्र के विचार में दीपोत्सव का वास्तविक संदेश केवल भव्य आयोजन करना नहीं, बल्कि रामराज के आदर्शों को शासन और समाज की कार्यशैली में उतारना है। जब लाखों दीप सरयू के तट पर जगमगाएंगे, तब यह दृश्य आस्था, सामूहिक प्रयास और अयोध्या की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बनेगा।

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