न नाम, न चेहरा… फिर भी 24 घंटे तक क्यों सुलगता रहा LPU? अफवाह से आगजनी तक पहुंचा छात्रों का गुस्सा

एक वायरल मोबाइल संदेश से शुरू हुई बेचैनी ने लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में 24 घंटे के भीतर गंभीर कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा कर दी। कथित छात्रा से जुड़ी घटना को लेकर सोशल मीडिया पर अलग-अलग दावे सामने आए, जिसके बाद बड़ी संख्या में छात्र परिसर से बाहर निकल आए। रात में जालंधर-फगवाड़ा राष्ट्रीय राजमार्ग जाम हुआ और दिन चढ़ने के साथ मामला तोड़फोड़ और आगजनी तक पहुंच गया।

Knews Desk- शनिवार रात सोशल मीडिया पर एक छात्रा से जुड़ी कथित घटना को लेकर कई तरह के संदेश तेजी से वायरल हुए। कुछ संदेशों में दुष्कर्म, कुछ में सामूहिक दुष्कर्म और कुछ में आत्महत्या की बात कही गई। इन दावों की उस समय आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई थी, लेकिन तेजी से फैलती सूचनाओं ने विश्वविद्यालय के छात्रावासों में बेचैनी बढ़ा दी।

रात करीब पौने दो बजे पुलिस को सूचना मिली कि परिसर में बड़ी संख्या में छात्र जमा हो रहे हैं। पुलिस मौके पर पहुंची तो उसे पता चला कि छात्रों के बीच कथित दुष्कर्म की घटना को लेकर अलग-अलग संदेश प्रसारित हो रहे हैं। करीब दो बजे छात्रों का विरोध विश्वविद्यालय परिसर से बाहर निकलकर जालंधर-फगवाड़ा राष्ट्रीय राजमार्ग तक पहुंच गया और हाईवे जाम कर दिया गया।

सुबह पुलिस ने छात्रों के बयानों के आधार पर अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ दुष्कर्म के आरोप में एफआईआर दर्ज की। मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल गठित किया गया। विश्वविद्यालय की ओर से भी छात्रों को जांच में शामिल करने की बात कही गई। हालांकि, इन कदमों के बावजूद छात्रों का गुस्सा तुरंत शांत नहीं हुआ।

इसके बाद परिसर में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं सामने आईं। कई वाहनों को नुकसान पहुंचाया गया और आगजनी की तस्वीरें व वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने लगे। देखते ही देखते मामला केवल कथित घटना की सच्चाई जानने की मांग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गंभीर कानून-व्यवस्था की चुनौती बन गया।

इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस के सामने एक बड़ी मुश्किल यह रही कि प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच कोई एक नेता या प्रतिनिधि नहीं था। न कोई स्पष्ट छात्र संगठन सामने आया, न कोई बैनर और न ही ऐसा तय मंच था, जिसके जरिए पुलिस पूरी भीड़ से बातचीत कर सके। अलग-अलग छात्रावासों से छात्र अपने स्तर पर जुड़ते गए और सोशल मीडिया पर सामने आ रही सूचनाओं के आधार पर विरोध बढ़ता गया।

पुलिस को एक ओर भीड़ और कानून-व्यवस्था को संभालना था, वहीं दूसरी ओर यह पता लगाने की चुनौती थी कि वास्तविक शिकायत क्या है और छात्रों तक सही जानकारी किस माध्यम से पहुंचाई जाए। सामने कोई एक शिकायतकर्ता या छात्र नेता नहीं होने के कारण बातचीत का पारंपरिक रास्ता भी उपलब्ध नहीं था।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने सोशल मीडिया पर प्रसारित दावों को गलत और भ्रामक बताया और छात्रों से आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करने की अपील की। पुलिस ने भी कहा कि शुरुआत में उसे ऐसी घटना की कोई शिकायत नहीं मिली थी। लेकिन सोशल मीडिया पर संदेशों और वीडियो के तेजी से प्रसार के कारण आधिकारिक अपील का असर सीमित दिखाई दिया।

एलपीयू में करीब 35 हजार छात्र पढ़ते हैं और बड़ी संख्या में विद्यार्थी परिसर के छात्रावासों में रहते हैं। ऐसे में एक स्थान से दूसरे स्थान तक घटनाक्रम तेजी से फैलता गया। डीआईजी नवीन सिंगला ने मौके पर पहुंचकर स्थिति संभाली। कई जिलों से वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और अतिरिक्त पुलिस बल को भी बुलाया गया।

यह घटनाक्रम किसी पारंपरिक छात्र आंदोलन से अलग दिखाई दिया। आमतौर पर पुलिस छात्र संगठनों के नेताओं से बातचीत कर उनकी मांगों को समझती है और उन्हीं के जरिए प्रदर्शनकारियों को शांत करने की कोशिश करती है। लेकिन एलपीयू में ऐसा कोई एक नेतृत्व सामने नहीं आया।

पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, कोई व्यक्तिगत छात्र भीड़ के नेता के तौर पर सामने नहीं आया। यही वजह रही कि स्थिति को नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण बना रहा। एक स्थान पर हालात संभलते दिखाई देते तो दूसरी जगह से फिर तनाव की सूचना मिलने लगती।

रविवार शाम तक विश्वविद्यालय का माहौल पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाया था। करीब 24 घंटे तक चले इस घटनाक्रम ने सोशल मीडिया से शुरू होकर बड़े छात्र आक्रोश और फिर तोड़फोड़-आगजनी तक पहुंचे घटनाक्रम की तस्वीर सामने रखी।

इस पूरे मामले की खास बात यह रही कि विरोध किसी एक संगठन या घोषित नेतृत्व के जरिए शुरू नहीं हुआ था। सोशल मीडिया पर वायरल संदेशों, छात्रों के बीच चर्चाओं, आशंकाओं और जवाब की मांग ने धीरे-धीरे इसे बड़ा रूप दिया। यही बेनाम और बिखरा हुआ स्वरूप पुलिस और प्रशासन के लिए इसे संभालने की चुनौती को और बढ़ाता रहा।

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