Knews Desk– उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। चुनाव आयोग ने राज्य की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान की तारीख तय की है। इन सीटों पर मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त हो रहा है। इनमें बीजेपी के आठ, समाजवादी पार्टी के एक और बहुजन समाज पार्टी के एक सदस्य की सीट शामिल है। समाजवादी पार्टी इस चुनाव में अपने मौजूदा राज्यसभा सदस्य प्रोफेसर रामगोपाल यादव को फिर से उम्मीदवार बनाए जाने की तैयारी में है। इसके अलावा पूर्व मुख्य सचिव और अखिलेश यादव के रणनीतिकार माने जाने वाले आलोक रंजन के नाम की भी चर्चा है। रिपोर्टों के मुताबिक, पार्टी आलोक रंजन को दोबारा राज्यसभा चुनाव में उतार सकती है। पिछले चुनाव में भी वह सपा के उम्मीदवार थे, लेकिन क्रॉस वोटिंग के कारण चुनाव हार गए थे।
सपा के लिए सबसे अहम सवाल तीसरे उम्मीदवार को लेकर है। पार्टी के पास मौजूदा विधानसभा संख्या के आधार पर दो उम्मीदवारों को जिताने के लिए पर्याप्त संख्या है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में इस समय 397 विधायक हैं और एक राज्यसभा सीट के लिए करीब 37 प्रथम वरीयता वोटों की जरूरत होगी। सपा के पास 101 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के दो विधायकों का समर्थन मिलने पर विपक्षी खेमे की संख्या 103 तक पहुंच सकती है।
इसी गणित के कारण सपा दो उम्मीदवारों को आसानी से राज्यसभा भेजने की स्थिति में है। दो उम्मीदवारों के लिए करीब 74 वोट की जरूरत होगी और इसके बाद पार्टी के पास कुछ वोट बचेंगे। यही अतिरिक्त वोट तीसरी सीट के लिए सपा की कोशिश का आधार बन रहे हैं। हालांकि तीसरे उम्मीदवार को जिताने के लिए पार्टी को अपने मौजूदा समर्थन से बाहर अतिरिक्त विधायकों का समर्थन जुटाना होगा। India Today के मुताबिक, तीसरी सीट के लिए सपा को अपने मौजूदा संख्या बल के अलावा करीब 16-17 अतिरिक्त विधायकों को साथ लाने की जरूरत पड़ सकती है। चर्चा है, जिसके जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को लेकर उसके राजनीतिक संदेश को आगे बढ़ाया जा सके। सपा तीसरे उम्मीदवार के जरिए अपने PDA सामाजिक समीकरण को भी सामने रखने की रणनीति पर विचार कर रही है। इस चुनाव में 2024 का राज्यसभा चुनाव भी सपा के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ बना हुआ है। उस चुनाव में सपा ने जया बच्चन, रामजी लाल सुमन और आलोक रंजन को उम्मीदवार बनाया था। क्रॉस वोटिंग के चलते आलोक रंजन चुनाव हार गए थे और बीजेपी के संजय सेठ जीतने में सफल रहे थे। इस बार पार्टी अपने विधायकों को एकजुट रखने और अतिरिक्त समर्थन जुटाने पर जोर दे सकती है।मौजूदा संख्या बल के अनुसार बीजेपी-नीत एनडीए के पास कई सीटों के लिए पर्याप्त विधायक हैं, जबकि सपा दो सीटों पर मजबूत स्थिति में है। तीसरी सीट के लिए सपा को अतिरिक्त समर्थन की जरूरत होगी। ऐसे में उम्मीदवारों की घोषणा के बाद ही चुनावी मुकाबले की पूरी तस्वीर स्पष्ट होगी। राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन