उत्तराखंड डेस्क रिपोर्ट, उत्तराखंड में आगामी 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। भाजपा, कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दलों ने चुनावी तैयारियों को धार देना शुरू कर दिया है। बैठकों, कार्यक्रमों और जनसंपर्क अभियानों के जरिए राजनीतिक दल लगातार अपनी जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। इसी बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत अपनी ग्रैंड एंट्री के साथ एक बार फिर राजनीतिक भूमिका में सक्रिय नजर आ रहे हैं। हालांकि, हरीश रावत की सक्रियता ऐसे समय में बढ़ी है.जब उनके पूर्व सहयोगी से जुड़े मामले को लेकर भी सियासी चर्चाएं चल रही है और रावत ने कांग्रेस के कुछ संगठनात्मक पदों से इस्तीफे की पेशकश की थी। आपको बता दे कि हरिश रावत का स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण काफी टाइम तक दिल्ली रहे, और अब लगभग 3 महीने के अंतराल के बाद पुनः हरिश रावत का राजनितिक गलिआरो में कदम रखना चर्चाओं का केन्द्र बन रहा हैं, जब हाल ही में हरिश रावत शक्ति प्रदर्शन करते नज़र आये। पिछले दिनों हरिद्वार के नारसन व देहरादून में चार सिद्ध के दर्शन करने से लेकर घंटाघर में स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद वह 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी के निर्देशों के अनुरूप काम करने की बात कहते भी नज़र आये, यही नही हरिश रावत द्वारा कांग्रेस को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं से जनता के बीच जाने का आह्वान किया गया। जिससे सवाल खड़े हो रहे है कि 2027 के चुनावी रण में हरीश रावत की वापसी कांग्रेस की रणनीति को किस तरह प्रभावित करती है और पार्टी के भीतर सामूहिक नेतृत्व के साथ उनकी भूमिका किस रूप में सामने आती है। बरहाल, यह हरिश रावत व कांग्रेस पार्टी के भीतर का अंधरूनी मामला हो लेकिन हरिश रावत की वापसी ने राजनितिक गलिआरो में बहस का नया मुद्दा भी छेड़ दिया है। जहाँ एक तरफ कांग्रेस हरिश रावत के मार्गदर्शन को काफी अहम मान रही है तो वही दूसरी ओर सत्ता पक्ष भाजपा तंज कस्ती भी दिखाई दे रही हैं, जिसके चलते आरोप प्रत्यारोप तेज़ नज़र आ रहा है।
अस्वस्थ होने के कारण लंबे समय बाद दिल्ली से उत्तराखंड लौटे पूर्व सीएम हरीश रावत ने 2027 मिशन से पहले सियासी पारा चढ़ा दिया है। तीन महीने के ब्रेक के बाद रावत एक्शन मोड में आ गये हैं। हरिद्वार के नारसन में कार्यकर्ताओं से मुलाकात, देहरादून में चार सिद्ध के दर्शन और घंटाघर पर महापुरुषों को नमन कर उन्होंने शक्ति प्रदर्शन किया। दिलचस्प है कि जब उनके सहयोगी पर ED की कार्रवाई पर सियासत गरम है और उन्होंने खुद पार्टी पदों से इस्तीफे की पेशकश की थी, तब उनकी यह वापसी कई मायने रखती है। उधर उनकी सक्रियता पर भाजपा ने तंज कसा है। भाजपा की माने तो सौ चूहे खा के बिल्ली हज को चली है। भाजपा के अनुसार हरीश रावत के कार्यकाल में भ्रष्टाचार चरम पर था, इसलिए कांग्रेस टूटी और दो बार भाजपा की सरकार बनी, अब कितने भी मंदिर जाएं, पाप के बाद हरिश रावत के पास पश्चाताप के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। इस बीच आपसी तंज व पलटवार का सिलसिला भी तेज़ होने लगा है।
कुल मिलाकर, 2027 चुनाव से पहले हरीश रावत की ये वापसी सिर्फ एक नेता की सक्रियता नहीं बल्कि कांग्रेस की आने वाली रणनीति का ट्रेलर भी है। तीन महीने तक स्वास्थ्य कारणों से दिल्ली में रहने के बाद जब हरीश रावत हरिद्वार के नारसन और देहरादून के घंटाघर तक सड़कों पर उतरे, तो इससे यह साफ है कि रावत अभी सियासी मैदान से बाहर नहीं हुए हैं। ED की कार्रवाई और इस्तीफे की पेशकश के बीच उनका मंदिर दर्शन और कार्यकर्ताओं में जोश भरना कांग्रेस को एकजुट करने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि भाजपा भ्रष्टाचार के पुराने आरोपों को हवा भी दे रही है। ऐसे में सवाल यही है कि क्या हरीश रावत का अनुभव और जनाधार कांग्रेस के लिए 2027 में संजीवनी बनेगा, या फिर भाजपा के हमले कांग्रेस के लिए नई चुनौती खड़ी करेंगे। वही ये हरदा का यह कमबैक कितना असरदार साबित होता है यह आने वाले कुछ महीने ही तय कर पायेंगे लेकिन इस बीच राजनीति जमकर होती दिखाई दे रही है।