काकोरी कांड से जुड़े अमर क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह की जन्मभूमि नवादा दशकों तक बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसती रही। बारिश में खन्नौत नदी के कारण गांव कई महीनों तक मुख्य इलाकों से कट जाता था। योगी सरकार के कार्यकाल में पक्के पुल समेत कई विकास परियोजनाओं ने गांव की तस्वीर बदल दी।
Knews Desk- देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। शाहजहांपुर के नवादा गांव में जन्मे इस क्रांतिकारी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष करते हुए 19 दिसंबर 1927 को फांसी के फंदे को चूम लिया था। हालांकि, आजादी के बाद उनकी जन्मभूमि नवादा को लंबे समय तक विकास की मूलधारा में जगह नहीं मिल सकी।
दशकों तक गांव के लोग खन्नौत नदी पर पक्के पुल की कमी का दंश झेलते रहे। बरसात के दिनों में नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद गांव का संपर्क आसपास के इलाकों से टूट जाता था। इसका असर इलाज, शिक्षा और किसानों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता था। करीब तीन पीढ़ियों ने इस परेशानी को झेला।
ठाकुर रोशन सिंह का जन्म 19 दिसंबर 1892 को शाहजहांपुर जिले के नवादा गांव में ठाकुर जंगी सिंह और कौशल्या देवी के घर हुआ था। बचपन से ही वह साहसी और शारीरिक रूप से मजबूत थे। उन्हें कुश्ती के साथ निशानेबाजी में भी महारत हासिल थी।
युवावस्था में वह महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़े। बाद में उनका संपर्क हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से हुआ और वह ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन का हिस्सा बन गए।
अंग्रेज अधिकारी की बंदूक छीनकर रोका था लाठीचार्ज
साल 1922 में बरेली में असहयोग आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर अंग्रेज पुलिस ने लाठीचार्ज किया। इसी दौरान ठाकुर रोशन सिंह ने आगे बढ़कर एक अंग्रेज अधिकारी की बंदूक छीन ली और हवा में गोली चलाकर लाठीचार्ज रुकवा दिया।
इस घटना के बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर दो साल की कठोर कैद की सजा दी। जेल से बाहर आने के बाद उनका जुड़ाव क्रांतिकारी गतिविधियों से और मजबूत हो गया।
बमरौली की घटना के बाद अंग्रेजों के निशाने पर आए
दिसंबर 1924 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ने संगठन के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से पीलीभीत के बमरौली गांव में कार्रवाई की थी। इस दौरान हुई गोलीबारी में एक व्यक्ति की मौत हो गई। इस मामले में ठाकुर रोशन सिंह पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया, लेकिन वह उस समय गिरफ्तार नहीं हो सके।
इसके बाद 1925 में हुए काकोरी ट्रेन एक्शन ने ब्रिटिश सरकार को क्रांतिकारियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई का मौका दिया। ठाकुर रोशन सिंह को भी गिरफ्तार कर मुकदमे में शामिल किया गया। हालांकि वह काकोरी ट्रेन एक्शन के दौरान मौके पर मौजूद नहीं थे, लेकिन क्रांतिकारी संगठन से जुड़े होने के कारण उन्हें भी मामले में दोषी ठहराया गया।
बिस्मिल जैसी सजा मांगने वाले रोशन सिंह
मुकदमे के दौरान जब अदालत में सजा सुनाई जा रही थी, तब ठाकुर रोशन सिंह ने बेहद निर्भीकता दिखाई। उन्होंने कहा कि उन्हें भी वही सजा दी जाए जो राम प्रसाद बिस्मिल को दी जा रही है।
अंततः अंग्रेजी अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुनाई। 19 दिसंबर 1927 को प्रयागराज की नैनी जेल में ठाकुर रोशन सिंह ने गीता का पाठ किया और ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष करते हुए फांसी का फंदा स्वीकार कर लिया।
आजादी के बाद भी गांव में जारी रही मुश्किलें
देश को आजादी मिलने के बाद भी ठाकुर रोशन सिंह का पैतृक गांव लंबे समय तक विकास की बाट जोहता रहा। खन्नौत नदी पर पक्का पुल नहीं होने के कारण बारिश और बाढ़ के मौसम में गांव का संपर्क कई महीनों तक प्रभावित रहता था।
इसका सबसे ज्यादा असर मरीजों, विद्यार्थियों और किसानों पर पड़ता था। आपात स्थिति में अस्पताल पहुंचना मुश्किल हो जाता था। बच्चों को स्कूल-कॉलेज जाने में परेशानी होती थी और किसानों को अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता था।
योगी सरकार ने सुनी ग्रामीणों की समस्या
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद नवादा गांव के लोगों ने अपनी समस्या मुख्यमंत्री के सामने रखी। ग्रामीणों ने खन्नौत नदी पर पक्के पुल की मांग की।
सरकार ने मामले को गंभीरता से लेते हुए 25 फरवरी 2018 को शाहजहांपुर में कई विकास परियोजनाओं के साथ खन्नौत नदी पर पक्के पुल, सड़क और डिग्री कॉलेज जैसी परियोजनाओं को मंजूरी दी। इसके बाद गांव की वर्षों पुरानी समस्या के समाधान की दिशा में काम शुरू हुआ।
खुद नवादा पहुंचे मुख्यमंत्री योगी
30 दिसंबर 2018 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद ठाकुर रोशन सिंह के पैतृक गांव नवादा पहुंचे। उन्होंने शहीद की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके परिवार के बुजुर्गों से मुलाकात कर उनका सम्मान किया।
मुख्यमंत्री के इस दौरे को ग्रामीणों ने शहीद के बलिदान के सम्मान के तौर पर देखा। लंबे समय से विकास की प्रतीक्षा कर रहे ग्रामीणों के लिए यह भावुक पल था।
पक्के पुल ने बदल दी इलाके की जिंदगी
खन्नौत नदी पर पक्का पुल बनने के बाद नवादा दरोवस्त और आसपास के गांवों का संपर्क बेहतर हुआ। बारिश के दौरान अब गांव के लोगों को पहले जैसी परेशानी नहीं झेलनी पड़ती। मरीजों को अस्पताल पहुंचाना आसान हुआ, विद्यार्थियों के लिए स्कूल-कॉलेज तक पहुंच बेहतर हुई और किसानों को अपनी उपज बाजार तक ले जाने में सुविधा मिली।
इसके साथ ही गांव में डिग्री कॉलेज और ठाकुर रोशन सिंह के पैतृक घर को स्मारक के तौर पर विकसित करने की दिशा में भी काम हुआ।
ठाकुर रोशन सिंह की जन्मभूमि की कहानी सिर्फ एक पुल बनने तक सीमित नहीं है। यह उस गांव की कहानी है, जिसने देश की आजादी के लिए अपना बेटा कुर्बान किया और फिर दशकों तक बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष किया। आज विकास के साथ नवादा की पहचान एक ऐसी धरती के रूप में और मजबूत हो रही है, जो आने वाली पीढ़ियों को शहीद ठाकुर रोशन सिंह के साहस और बलिदान की याद दिलाती रहेगी।