पोलियो, गरीबी और घरेलू हिंसा… फिर भी नहीं टूटी शर्मिला धनकड़

Knews Desk– ग्लासगो में आयोजित 23वें कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत की पैरा एथलीट शर्मिला धनकड़ ने महिलाओं की पैरा शॉट पुट F57 स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। उन्होंने 9.81 मीटर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो कर भारत को दूसरा स्वर्ण पदक दिलाया। इसके साथ ही वह इस स्पर्धा में गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय पैरा एथलीट बन गई हैं। लेकिन इस ऐतिहासिक जीत के पीछे संघर्ष, दर्द और हिम्मत की ऐसी कहानी है, जिसने हर किसी को भावुक कर दिया।हरियाणा के चितरौली गांव में जन्मी शर्मिला धनकड़ का बचपन बेहद कठिन परिस्थितियों में बीता। जब वह सिर्फ दो साल की थीं, तब पोलियो के कारण उनका बायां पैर प्रभावित हो गया। परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। उनकी मां दृष्टिबाधित थीं और पिता किसान थे, लेकिन सूखाग्रस्त इलाके में खेती से ज्यादा आमदनी नहीं होती थी। तमाम मुश्किलों के बीच उन्होंने पढ़ाई और जिंदगी की चुनौतियों का सामना किया।

18 साल की उम्र में उनकी शादी हुई, लेकिन वैवाहिक जीवन बेहद दर्दनाक साबित हुआ। उन्हें दहेज प्रताड़ना और घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा। रोजाना मारपीट और मानसिक उत्पीड़न ने उन्हें पूरी तरह तोड़ दिया। हालात ऐसे हो गए कि उन्होंने अपनी जिंदगी खत्म करने तक का विचार कर लिया। आखिरकार उन्होंने पहले पति से तलाक ले लिया।तलाक के बाद शर्मिला के सामने दो बेटियों की परवरिश की जिम्मेदारी थी। उन्होंने कई छोटे-मोटे काम किए ताकि बच्चों का भविष्य सुरक्षित कर सकें। इसी दौरान 28 साल की उम्र में उनकी दूसरी शादी अजीत सिंह से हुई। यही उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।

अजीत सिंह ने शर्मिला को पैरा एथलेटिक्स में करियर बनाने के लिए प्रेरित किया। उनकी सलाह पर शर्मिला ने खेल की दुनिया में कदम रखा और राव तुलाराम स्टेडियम में पूर्व पैरा एथलीट टेकचंद के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण शुरू किया। 34 साल की उम्र में उन्होंने पैरा एथलेटिक्स में डेब्यू किया और अपनी मेहनत से लगातार सफलता की सीढ़ियां चढ़ती गईं।

शर्मिला ने 2022 के बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में भी हिस्सा लिया था, लेकिन तब वह चौथे स्थान पर रहकर पदक से चूक गई थीं। हालांकि उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार मेहनत जारी रखी। उसी का नतीजा ग्लासगो 2026 में देखने को मिला, जहां उन्होंने 9.81 मीटर का थ्रो कर गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया।शर्मिला धनकड़ की यह उपलब्धि सिर्फ एक स्वर्ण पदक नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और कभी हार न मानने की मिसाल है। पोलियो, गरीबी, घरेलू हिंसा और मानसिक तनाव जैसी कठिनाइयों से निकलकर उन्होंने साबित कर दिया कि मजबूत इरादों के सामने कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती। उनकी कहानी आज लाखों लोगों, खासकर महिलाओं और दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बन गई है।

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