सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल जारी रही तो सरकार के पास क्या विकल्प? क्या दोहराया जाएगा इरोम शर्मिला वाला इतिहास?

Knews Desk- जलवायु कार्यकर्ता और सामाजिक आंदोलनकारी सोनम वांगचुक अपनी मांगों को लेकर लगातार भूख हड़ताल पर बैठे हुए हैं। शुक्रवार को उनके अनशन का 20वां दिन है। लंबे समय तक भोजन नहीं लेने की वजह से उनकी सेहत तेजी से बिगड़ रही है। बताया जा रहा है कि उनका वजन 9 किलोग्राम से ज्यादा कम हो चुका है और डॉक्टरों ने भी स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर वांगचुक अनशन खत्म करने से इनकार करते हैं और सरकार उनकी मांगों पर कोई फैसला नहीं लेती है, तो आगे क्या कदम उठाया जा सकता है?

दिल्ली हाई कोर्ट ने भी सोनम वांगचुक की गिरती सेहत पर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि हर व्यक्ति का जीवन बेहद कीमती है और उनकी सुरक्षा के लिए हर संभव प्रयास किए जाने चाहिए। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि सरकारी डॉक्टर नियमित रूप से उनकी जांच करें और स्वास्थ्य की लगातार निगरानी की जाए।

19 दिनों में घटा 9 किलो से ज्यादा वजन

डॉक्टरों के मुताबिक, लंबे समय तक भूखे रहने से शरीर में ऊर्जा की कमी होने लगती है और इसका असर धीरे-धीरे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर पड़ सकता है। सोनम वांगचुक की हालत भी अब गंभीर चरण में पहुंचने लगी है। हालांकि, उन्होंने अभी तक अपना अनशन खत्म करने से इनकार कर दिया है।

हाल ही में जारी एक वीडियो संदेश में वांगचुक ने कहा था कि बिना किसी ठोस जवाब के आंदोलन समाप्त करना सही संदेश नहीं देगा। उन्होंने राजनीतिक दलों और समर्थकों की अपील के बावजूद अपनी भूख हड़ताल जारी रखने का फैसला किया है। साथ ही उन्होंने लोगों से 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च में शामिल होने की अपील भी की है।

क्या सरकार इरोम शर्मिला जैसा कदम उठा सकती है?

सोनम वांगचुक की लगातार बिगड़ती सेहत के बीच अब चर्चा हो रही है कि क्या सरकार भी वही तरीका अपना सकती है, जो मणिपुर की सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला के मामले में अपनाया गया था। इरोम शर्मिला ने करीब 16 साल तक भूख हड़ताल की थी और इस दौरान उन्हें जबरन नली के जरिए पोषण दिया जाता रहा।

इरोम शर्मिला को ‘आयरन लेडी ऑफ मणिपुर’ के नाम से जाना जाता है। उन्होंने साल 2000 में मणिपुर से सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून यानी AFSPA हटाने की मांग को लेकर अनशन शुरू किया था।

इरोम शर्मिला ने क्यों शुरू किया था आंदोलन?

2 नवंबर 2000 को मणिपुर के इंफाल घाटी के मालोम इलाके में असम राइफल्स की कथित गोलीबारी में 10 आम नागरिकों की मौत हो गई थी। इस घटना के विरोध में इरोम शर्मिला ने 5 नवंबर 2000 से भूख हड़ताल शुरू कर दी थी।

पुलिस ने उनके अनशन को आत्महत्या का प्रयास बताते हुए उन्हें हिरासत में ले लिया था। इसके बाद उन्हें अस्पताल में रखा गया, जहां उनकी जान बचाने के लिए नाक के रास्ते पाइप डालकर तरल पोषण दिया जाने लगा।

16 साल तक नली के जरिए दी गई थी डाइट

इरोम शर्मिला के लंबे अनशन के दौरान अस्पताल में डॉक्टरों और नर्सों की टीम लगातार उनकी निगरानी करती थी। उन्हें नाक के जरिए डाली गई ट्यूब से पानी, पोषक तत्व और जरूरी दवाएं दी जाती थीं। कई सालों तक इसी प्रक्रिया के जरिए उनका जीवन बचाया गया।

साल 2016 में विधानसभा चुनाव लड़ने के फैसले के बाद इरोम शर्मिला ने अपना अनशन खत्म किया था। उन्होंने 16 साल बाद पहली बार खुद अपने हाथों से शहद चखकर अनशन तोड़ा था।

अब सोनम वांगचुक के मामले में भी सवाल यही है कि अगर उनकी सेहत और बिगड़ती है तो क्या प्रशासन भी जीवन बचाने के लिए इसी तरह का कदम उठाएगा या फिर सरकार और आंदोलनकारियों के बीच कोई समाधान निकलेगा।

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