कागज फेंके, जजों से की बदसलूकी… फिर भी कार्रवाई से पीछे हटा सुप्रीम कोर्ट, जानिए क्यों

Knews Desk- सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बेंच के सामने कागज फेंकने और अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वाले एक याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने इस मामले में कोई एफआईआर या अन्य कार्रवाई न करने का फैसला लिया है। उनका मानना है कि इस तरह की हरकतें अक्सर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के उद्देश्य से की जाती हैं और यदि कड़ी कार्रवाई की जाती है तो संबंधित व्यक्ति अपने मकसद में सफल हो सकता है।यह घटना शुक्रवार को उस समय हुई जब जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उस समय CJI सूर्यकांत कोर्टरूम में मौजूद नहीं थे। याचिकाकर्ता बिना किसी वकील के खुद अपना पक्ष रख रहा था। सुनवाई के दौरान उसने खुद को “संप्रभु” बताते हुए अदालत के सामने मौजूद केस फाइल के कागज हवा में उछाल दिए और बेंच के प्रति अपशब्दों का इस्तेमाल करने लगा। कोर्टरूम में कुछ देर के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया, जिसके बाद सुरक्षाकर्मियों ने तत्काल हस्तक्षेप करते हुए उसे कोर्ट से बाहर ले गए।

घटना की जानकारी मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार की ओर से याचिकाकर्ता के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की संभावना पर विचार किया गया। हालांकि, जब पूरे मामले की जानकारी CJI सूर्यकांत को दी गई तो उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिया कि इस मामले में आगे कोई कार्रवाई नहीं की जाए। उनका मानना था कि ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई से संबंधित व्यक्ति को अनावश्यक प्रचार मिल सकता है, जो उसके व्यवहार का उद्देश्य भी हो सकता है।

सुनवाई के दौरान क्या हुआ?

सुनवाई शुरू होते ही याचिकाकर्ता ने अदालत से कहा, “योर ऑनर, मैं आपको लखनऊ के एसीपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश देता हूं।” इस पर जस्टिस के.वी. विश्वनाथन ने आश्चर्य जताते हुए पूछा, “क्या आप मुझे आदेश दे रहे हैं?” जवाब में याचिकाकर्ता ने कहा, “मेरी तरफ से बस इतना ही, सब कुछ रिकॉर्ड में है,” और इसके तुरंत बाद उसने केस फाइल के कागज हवा में फेंक दिए तथा गाली-गलौज शुरू कर दी।याचिकाकर्ता के इस व्यवहार के बाद कोर्ट की सुरक्षा टीम ने तुरंत उसे हिरासत में लेकर कोर्टरूम से बाहर कर दिया। हालांकि, सर्वोच्च अदालत के प्रशासन और CJI सूर्यकांत ने मामले को आगे न बढ़ाने का फैसला लेते हुए इसे यहीं समाप्त करने का निर्णय लिया। यह फैसला इस सोच पर आधारित है कि न्यायालय की गरिमा बनाए रखते हुए ऐसे मामलों को अनावश्यक प्रचार का माध्यम नहीं बनने देना चाहिए।

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