अमरोहा हलाला केस मे हाईकोर्ट ने ‘हलाला’ को ‘गैंगरेप’ जैसा अपराध क्यों माना? जानिए पूरा खबर से….

अमरोहा से जुड़े हलाला मामले में अदालत ने अपनी कानूनी व्याख्या काफी स्पष्ट रूप में रखी है। पॉक्सो कानून के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति के साथ यौन संबंध बनाना अपराध माना जाता है, फिर चाहे उसमें सहमति ही क्यों न बताई जाए। इस कानून में किसी भी धार्मिक, सामाजिक या पारंपरिक प्रथा को कोई कानूनी छूट नहीं दी गई है।

Knews Desk- इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अमरोहा से जुड़ी जिस एफआईआर को रद्द करने से मना किया है, वह सिर्फ एक परिवार का विवाद नहीं बल्कि एक बड़े सामाजिक और कानूनी प्रश्न को सामने लाता है। मामला उस स्थिति से जुड़ा है, जिसमें धार्मिक परंपराओं की आड़ में एक नाबालिग लड़की के साथ कथित तौर पर बार-बार यौन शोषण होने के आरोप लगे हैं। न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने साफ कहा कि किसी भी पर्सनल लॉ का सहारा लेकर आपराधिक जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। यह टिप्पणी भले ही संक्षिप्त हो, लेकिन इसके पीछे संविधान, कानून और सामाजिक न्याय से जुड़ी गहरी बहस मौजूद है।

प्राथमिकी के अनुसार पूरा घटनाक्रम

एफआईआर के अनुसार पीड़िता का विवाह मात्र 15 वर्ष की उम्र में कर दिया गया था। शादी के बाद उसके साथ मारपीट की बात सामने आई और कुछ ही महीनों में उसे तीन तलाक दे दिया गया। इसके बाद पति ने दोबारा शादी की इच्छा जताई, जिसके लिए कथित तौर पर इस्लामी परंपरा के तहत हलाला की प्रक्रिया अपनाने की बात कही गई। इस प्रक्रिया के अनुसार महिला को पहले किसी अन्य पुरुष से निकाह करना और फिर तलाक लेना आवश्यक बताया गया।

हलाला के नाम पर शोषण के आरोप

आरोप है कि हलाला की प्रक्रिया के दौरान एक मौलाना द्वारा पीड़िता के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए, जबकि उस समय वह नाबालिग थी। आगे चलकर जब दोबारा तलाक की स्थिति बनी तो कथित रूप से कहा गया कि इस बार दो बार हलाला करना होगा। इसी क्रम में फरवरी 2025 में दो व्यक्तियों द्वारा उसके साथ दुष्कर्म किए जाने के आरोप सामने आए। अदालत ने इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए इसे सामूहिक बलात्कार की श्रेणी में रखा है।

POCSO कानून और अदालत की कानूनी व्याख्या

अदालत ने स्पष्ट किया कि भारत का POCSO कानून 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति के साथ यौन संबंध को अपराध मानता है, चाहे वह सहमति से ही क्यों न हो। इस कानून में किसी भी धार्मिक या पारिवारिक परंपरा को छूट नहीं दी गई है। सर्वोच्च न्यायालय के 2017 के इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ फैसले का हवाला देते हुए यह भी कहा गया कि विवाह के भीतर भी नाबालिग के साथ यौन संबंध अपराध माना जाएगा।

कृष्णजी शुक्ल, इलाहाबाद हाईकोर्ट अधिवक्ता केंद्र सरकार

हलाला और तीन तलाक पर चल रही बहस

यह मामला हलाला प्रथा पर लंबे समय से चल रही बहस को फिर से सामने लाता है। मुस्लिम महिला संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा इस प्रथा पर पहले भी सवाल उठाए जाते रहे हैं। 2017 के शायरा बानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित किया था, हालांकि हलाला और बहुविवाह पर उस समय विस्तृत निर्णय नहीं दिया गया था।

पर्सनल लॉ और संवैधानिक सवाल

याचिकाकर्ताओं का कहना रहा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ महिलाओं को असुरक्षित स्थिति में डालता है और यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करता है। वहीं कुछ धार्मिक संगठनों का तर्क है कि पर्सनल लॉ संविधान के दायरे से बाहर है। अमरोहा का यह मामला इस बहस को व्यावहारिक रूप में सामने लाता है, जहां परंपरा का दुरुपयोग सीधे अपराध का रूप ले लेता है।

महिलाओं के अधिकार और ऐतिहासिक संदर्भ

तीन तलाक और पर्सनल लॉ के संदर्भ में महिलाओं के अधिकारों का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है। 1985 के शाहबानो मामले से लेकर 2017 के शायरा बानो फैसले और 2019 के कानून तक इस दिशा में कई बदलाव हुए हैं। इसके बावजूद यह सवाल बना हुआ है कि क्या इन सुधारों का वास्तविक असर समाज के स्तर पर पूरी तरह दिख पाया है या नहीं।

अदालत का निष्कर्ष और बड़ा संदेश

इस फैसले का सबसे अहम पहलू यह है कि अदालत ने साफ कर दिया कि धार्मिक प्रथाओं की स्वतंत्रता संविधान से ऊपर नहीं हो सकती। जहां भी किसी व्यक्ति, खासकर नाबालिग की गरिमा, स्वतंत्रता और सुरक्षा का उल्लंघन होता है, वहां आपराधिक कानून सर्वोपरि होगा। अदालत ने प्रथा की वैधता पर सीधा निर्णय देने से बचते हुए उसके दुरुपयोग को स्पष्ट रूप से अपराध की श्रेणी में रखा है।

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