Knews Desk- अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बावजूद देश में पेट्रोल और डीजल के दाम में बड़ी कमी नहीं आई है। इसकी एक बड़ी वजह केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले टैक्स हैं। आमतौर पर लोगों का ध्यान केंद्र की एक्साइज ड्यूटी पर जाता है, लेकिन ईंधन की अंतिम कीमत तय करने में राज्यों का VAT (वैल्यू एडेड टैक्स), सेस और सरचार्ज भी अहम भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि अलग-अलग राज्यों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कई रुपये का अंतर देखने को मिलता है।इसी टैक्स व्यवस्था में बिहार की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है। राज्य पेट्रोल और डीजल पर VAT के अलावा 30 प्रतिशत अतिरिक्त सरचार्ज भी वसूलता है, जो देश में सबसे अधिक माना जाता है।
बिहार का टैक्स मॉडल क्या है?
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, बिहार में पेट्रोल पर 23.58 प्रतिशत या 16.65 रुपये प्रति लीटर (जो अधिक हो) के हिसाब से VAT लगाया जाता है। इसके अलावा VAT की राशि पर 30 प्रतिशत अतिरिक्त सरचार्ज भी वसूला जाता है, जिसे “Irrecoverable Tax” के रूप में दर्ज किया जाता है।इसी तरह डीजल पर 16.37 प्रतिशत या 12.33 रुपये प्रति लीटर (जो अधिक हो) VAT लगाया जाता है और इस पर भी 30 प्रतिशत अतिरिक्त सरचार्ज लागू होता है। यही व्यवस्था बिहार को अन्य राज्यों से अलग बनाती है।
किन राज्यों में लगता है ज्यादा टैक्स?
हालांकि अतिरिक्त सरचार्ज के मामले में बिहार सबसे आगे है, लेकिन कुल टैक्स के हिसाब से तस्वीर अलग है।
- तेलंगाना पेट्रोल पर करीब 35 प्रतिशत VAT वसूलता है।
- आंध्र प्रदेश VAT के साथ प्रति लीटर अतिरिक्त रोड डेवलपमेंट सेस भी लेता है।
- तमिलनाडु प्रतिशत आधारित VAT के साथ फिक्स टैक्स मॉडल अपनाता है।
- असम में प्रतिशत आधारित टैक्स और न्यूनतम कर, दोनों लागू हैं।
यही वजह है कि देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतें एक जैसी नहीं होतीं।
राज्य इतना टैक्स क्यों लगाते हैं?
पेट्रोल और डीजल अभी भी GST के दायरे से बाहर हैं। केंद्र सरकार इन पर एक्साइज ड्यूटी लगाती है, जबकि राज्य सरकारें VAT, सेस और अन्य स्थानीय कर वसूलती हैं। राज्यों के लिए ईंधन से मिलने वाला राजस्व सड़क निर्माण, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक योजनाओं और अन्य विकास कार्यों के लिए आय का बड़ा स्रोत है। इसलिए अधिकांश राज्य इसमें कटौती करने से बचते हैं।
GST में शामिल करने पर सहमति क्यों नहीं?
कई वर्षों से पेट्रोल और डीजल को GST के दायरे में लाने की मांग उठती रही है। यदि ऐसा होता है तो देशभर में ईंधन की कीमतों में काफी समानता आ सकती है और कई राज्यों में पेट्रोल-डीजल सस्ता भी हो सकता है। लेकिन राज्यों को आशंका है कि इससे उनका राजस्व कम हो जाएगा और टैक्स तय करने की स्वतंत्रता भी घट जाएगी। इसी कारण अब तक इस पर सर्वसम्मति नहीं बन सकी है।
आम आदमी पर क्या असर पड़ता है?
ईंधन पर अधिक टैक्स का असर केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने से सब्जियां, दूध, निर्माण सामग्री, ई-कॉमर्स डिलीवरी और अन्य रोजमर्रा की वस्तुएं भी महंगी हो जाती हैं। ट्रक और बस ऑपरेटर किराया बढ़ाते हैं, जिसका सीधा असर उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है।यही कारण है कि भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के दाम से नहीं, बल्कि राज्यों की टैक्स नीति से भी तय होती हैं। बिहार का 30 प्रतिशत अतिरिक्त सरचार्ज इसी बहस का सबसे बड़ा उदाहरण बन गया है।