Knews Desk- रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार को अक्सर आधुनिक दौर की समस्या माना जाता है, लेकिन इतिहास बताता है कि यह बीमारी सदियों पुरानी है। मुगल साम्राज्य के दौरान भी सत्ता और प्रभाव का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए किया जाता था। यहां तक कि अपने कठोर शासन और अनुशासन के लिए प्रसिद्ध मुगल बादशाह औरंगजेब भी इस समस्या को पूरी तरह खत्म नहीं कर सके। इतिहास में एक ऐसा प्रसंग मिलता है, जब उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते अपनी ही बहन रोशनआरा बेगम से ‘मल्लिका-ए-जहां’ का सम्मानजनक पद वापस ले लिया।इतिहासकारों और जहांआरा बेगम की आत्मकथा के अनुसार, मुगल बादशाह शाहजहां के अंतिम वर्षों में उत्तराधिकार की लड़ाई छिड़ गई थी। इस संघर्ष में बड़ी बेटी जहांआरा ने अपने भाई दारा शिकोह का साथ दिया, जबकि छोटी बहन रोशनआरा ने औरंगजेब का समर्थन किया। सत्ता हासिल करने के बाद औरंगजेब ने अपने समर्थन के बदले रोशनआरा को ‘मल्लिका-ए-जहां’ का खिताब दिया।
हालांकि समय के साथ रोशनआरा पर अपने पद और प्रभाव का दुरुपयोग करने के आरोप लगने लगे। कहा जाता है कि दरबार में किसी भी काम को करवाने, अधिकारियों की नियुक्ति, व्यापारिक मामलों और शाही मुलाकातों तक के लिए धन वसूला जाता था। धीरे-धीरे उसके खिलाफ शिकायतों का अंबार लगने लगा। हाकिमों, व्यापारियों और आम फरियादियों की शिकायतें लगातार बादशाह तक पहुंचने लगीं।शाहजहां की मृत्यु के बाद औरंगजेब आगरा पहुंचे और अपनी बड़ी बहन जहांआरा से मुलाकात की। उस समय उन्होंने एक मोटा दस्तावेजी बस्ता जहांआरा को सौंपा, जिसमें रोशनआरा के खिलाफ भ्रष्टाचार और बेईमानी से जुड़ी अनेक शिकायतें और सरकारी रिपोर्टें शामिल थीं। जहांआरा ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि जैसे-जैसे उन्होंने वे दस्तावेज पढ़े, वह स्तब्ध रह गईं। उनके अनुसार, रोशनआरा पर सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात और धन इकट्ठा करने की ऐसी लालसा हावी हो गई थी कि उसने अपने पद की गरिमा को भी नजरअंदाज कर दिया था।
औरंगजेब ने जहांआरा से आग्रह किया कि वे ‘मल्लिका-ए-जहां’ का पद स्वीकार कर लें। शुरुआत में जहांआरा ने यह प्रस्ताव ठुकराने की कोशिश की। उनका कहना था कि रोशनआरा का अधिकार छीनना उचित नहीं होगा, लेकिन औरंगजेब अपने फैसले पर अडिग रहे। अंततः भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों को देखते हुए उन्होंने रोशनआरा को इस पद से हटा दिया।हालांकि, इतिहासकारों का मानना है कि केवल रोशनआरा ही नहीं, बल्कि उस समय मुगल प्रशासन के कई उच्च अधिकारी भी रिश्वतखोरी में लिप्त थे। प्रसिद्ध इतिहासकार यदुनाथ सरकार ने अपनी पुस्तक ‘औरंगजेब’ में उल्लेख किया है कि कई वजीर, काजी और दरबारी अधिकारी पद दिलाने, पद बचाने और सिफारिश करने के बदले खुलकर धन लेते थे। यहां तक कि छोटे-छोटे सरकारी पदों के लिए भी रिश्वत देना आम बात बन चुकी थी।
यह घटना दिखाती है कि मुगल साम्राज्य जैसे विशाल शासन में भी भ्रष्टाचार एक गंभीर चुनौती था। हालांकि औरंगजेब ने अपनी बहन के खिलाफ कार्रवाई कर यह संदेश देने की कोशिश की कि सत्ता का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, लेकिन पूरे प्रशासन से रिश्वतखोरी खत्म करना उनके लिए भी संभव नहीं हो सका। इसी वजह से यह प्रसंग आज भी इतिहास में सत्ता, पारिवारिक रिश्तों और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की एक चर्चित मिसाल के रूप में याद किया जाता है।