Knews Desk- हाल के ईरान संघर्ष के बाद वैश्विक स्तर पर अमेरिका की सैन्य क्षमता और उसकी सीमाओं को लेकर नई बहस तेज हो गई है। भले ही अमेरिका को दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति माना जाता है, लेकिन ईरान के साथ लंबे संघर्ष और उसके परिणामों ने उसकी रणनीतिक चुनौतियों को उजागर कर दिया है। इसी पृष्ठभूमि में अब सवाल उठ रहा है कि यदि ताइवान को लेकर चीन के साथ सीधा सैन्य टकराव होता है, तो क्या अमेरिका लंबे समय तक संघर्ष झेल पाएगा?
विश्लेषकों का मानना है कि हालिया घटनाक्रम ने यह संकेत दिया है कि चीन अब केवल आर्थिक महाशक्ति ही नहीं, बल्कि तकनीकी, मिसाइल, ड्रोन और युद्ध उत्पादन क्षमता के क्षेत्र में भी तेजी से अमेरिका के बराबर खड़ा होता दिख रहा है। ताइवान को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव लंबे समय से बना हुआ है और चीन इसे अपनी “रेड लाइन” बता चुका है।

रिपोर्टों के अनुसार, ईरान संघर्ष के दौरान अमेरिका ने बड़े पैमाने पर मिसाइल और इंटरसेप्टर सिस्टम का इस्तेमाल किया, जिससे उसके हथियार भंडार पर दबाव बढ़ गया। विशेषज्ञों का कहना है कि लंबी दूरी की प्रिसिजन मिसाइलों की उपलब्धता पहले से ही सीमित थी और हालिया सैन्य अभियानों ने स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है। दूसरी ओर, चीन अपने रक्षा उत्पादन को तेज गति से बढ़ा रहा है। वह युद्धपोत, पनडुब्बियां, मिसाइलें और ड्रोन तकनीक पर लगातार निवेश कर रहा है। इसके साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर युद्ध और सैटेलाइट तकनीक में भी उसकी क्षमता तेजी से बढ़ रही है।
अमेरिकी थिंक टैंक की वॉर गेम रिपोर्ट्स के अनुसार, यदि ताइवान को लेकर युद्ध छिड़ता है तो शुरुआती दिनों में ही अमेरिका की लंबी दूरी की मिसाइलों का बड़ा हिस्सा खर्च हो सकता है। साथ ही जापान, गुआम और फिलीपींस जैसे क्षेत्रों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर भी खतरा बढ़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, चीन की बढ़ती मिसाइल क्षमता और उसकी सैन्य तैयारी दक्षिण चीन सागर और प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी नौसैनिक वर्चस्व को चुनौती दे रही है। हालांकि अमेरिका भी अपनी रणनीति में बदलाव कर रहा है और “Hellscape Warfare” जैसी नई अवधारणाओं पर काम कर रहा है, जिसमें ड्रोन और स्वायत्त हथियारों के जरिए युद्ध क्षमता बढ़ाने पर जोर है।
फिर भी रक्षा उत्पादन की धीमी गति और आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियां अमेरिका के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। ऐसे में संभावित अमेरिका-चीन संघर्ष केवल सैन्य ताकत ही नहीं, बल्कि तकनीक, उत्पादन क्षमता और रणनीतिक धैर्य की भी बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।