तेल खपत में भारत तीसरे स्थान पर, ट्रांसपोर्ट सेक्टर बना सबसे बड़ा उपभोक्ता

KNEWS DESK- पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच दुनिया की सबसे अहम समुद्री तेल आपूर्ति लाइन हॉर्मुज स्ट्रेट पर संकट गहराता जा रहा है। इस जलमार्ग के प्रभावित होने से वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और गैस की सप्लाई पर असर पड़ रहा है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह स्थिति आर्थिक चुनौती बनती जा रही है। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से पेट्रोल और डीजल का इस्तेमाल सोच-समझकर करने की अपील की है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में ईंधन की बचत केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं, बल्कि देशहित का विषय है। उन्होंने लोगों से अनावश्यक ईंधन खर्च कम करने और ऊर्जा संरक्षण को अपनाने की अपील की। पीएम ने यह भी कहा कि यदि भारत आयातित पेट्रोलियम उत्पादों पर अपनी निर्भरता कम करेगा, तो विदेशी मुद्रा की बचत होगी और अंतरराष्ट्रीय संकटों का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीमित रहेगा।

हॉर्मुज स्ट्रेट क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

हॉर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है। खाड़ी देशों से निकलने वाला बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से दुनिया भर में पहुंचता है। ईरान से जुड़े तनाव के कारण यदि इस मार्ग में बाधा आती है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित होती है और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ जाती है।

भारत अपनी जरूरत का करीब 85 से 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर भारत पर पड़ता है।

बढ़ती कीमतों ने बढ़ाई आर्थिक चिंता

विशेषज्ञों के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी और रुपये की कमजोरी भारत की आर्थिक चिंताओं को बढ़ा रही है। महंगा तेल खरीदने से देश का आयात बिल बढ़ता है, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है और महंगाई बढ़ने का खतरा भी रहता है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में भारत ने कच्चे तेल के आयात पर करीब 134.7 अरब डॉलर खर्च किए। यही वजह है कि सरकार अब ईंधन की बचत को राष्ट्रीय प्राथमिकता के तौर पर पेश कर रही है।

भारत में रोज कितनी होती है तेल की खपत?

भारत दुनिया में तेल खपत के मामले में अमेरिका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर है। देश में रोजाना लगभग 55 लाख बैरल यानी करीब 87.45 करोड़ लीटर तेल की खपत होती है। इतनी बड़ी मांग के कारण वैश्विक बाजार में होने वाला हर उतार-चढ़ाव भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।

ट्रांसपोर्ट सेक्टर सबसे बड़ा उपभोक्ता

पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के मुताबिक, भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल डीजल का होता है। कुल तेल खपत में डीजल की हिस्सेदारी लगभग 37 से 39 प्रतिशत है। इसका उपयोग मुख्य रूप से ट्रक, बस, खेती और भारी वाहनों में होता है।

वहीं पेट्रोल की हिस्सेदारी करीब 14 से 16 प्रतिशत है, जिसका उपयोग कार, बाइक और अन्य निजी वाहनों में होता है। देश में तेल की सबसे ज्यादा खपत ट्रांसपोर्ट और औद्योगिक क्षेत्रों में होती है।

2045 तक भी बनी रहेगी पेट्रोल-डीजल की बड़ी मांग

अनुमान है कि वर्ष 2045 तक भारत की कुल तेल खपत में पेट्रोल और डीजल की हिस्सेदारी 58 प्रतिशत से अधिक रहेगी। हालांकि सरकार इस निर्भरता को कम करने की दिशा में लगातार प्रयास कर रही है।

इलेक्ट्रिक व्हीकल, फ्लेक्स फ्यूल, एथेनॉल मिश्रण और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देकर सरकार आयातित तेल पर निर्भरता घटाना चाहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि देश ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को तेजी से अपनाता है, तो भविष्य में वैश्विक संकटों का असर कम किया जा सकता है।

आम लोगों के लिए क्या है संदेश?

सरकार का साफ संदेश है कि छोटे-छोटे प्रयास भी बड़ा असर डाल सकते हैं। अनावश्यक वाहन उपयोग कम करना, कार पूलिंग अपनाना, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग बढ़ाना और ईंधन की बचत करना मौजूदा समय की जरूरत बन गया है। इससे न केवल व्यक्तिगत खर्च घटेगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी राहत मिलेगी।

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