Knews Desk– चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की इस वर्ष भारत यात्रा की संभावना को भारत–चीन संबंधों में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है। यदि यह यात्रा होती है, तो यह 2020 के सीमा संघर्ष के बाद दोनों देशों के रिश्तों में आई ठंडक के बीच एक संभावित नरमी का संकेत दे सकती है। यह दौरा 2026 में भारत द्वारा आयोजित होने वाले ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के दौरान हो सकता है, जिससे इस मंच की भूमिका और भी अहम हो जाती है।

भारत और चीन के संबंध जून 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद गंभीर रूप से प्रभावित हो गए थे। इस घटना में दोनों देशों के सैनिकों की जान गई और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर लंबे समय तक तनाव बना रहा। इसके बाद से दोनों देशों के बीच कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक वार्ताएं हुई हैं, लेकिन आपसी अविश्वास पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया है। ऐसे माहौल में शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा को सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
2026 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन
भारत द्वारा 2026 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी इस संभावित कूटनीतिक पहल का एक प्रमुख कारण बनकर उभरी है। चीन ने भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का समर्थन किया है और इस मंच पर सहयोग की इच्छा जताई है। भारत ने औपचारिक रूप से शी जिनपिंग को शिखर सम्मेलन में शामिल होने का निमंत्रण दिया है, जिसे चीन ने सकारात्मक रूप से लिया है। इससे यह संकेत मिलता है कि दोनों देश बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग के जरिए अपने संबंधों को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। ब्रिक्स समूह जिसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक महत्वपूर्ण मंच है। यह वैश्विक आर्थिक, राजनीतिक और विकास से जुड़े मुद्दों पर सहयोग को बढ़ावा देता है। भारत और चीन के लिए यह मंच एक ऐसा अवसर प्रदान करता है, जहां वे अपने द्विपक्षीय विवादों को अलग रखते हुए साझा हितों पर काम कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शी जिनपिंग इस शिखर सम्मेलन में शामिल होते हैं, तो इससे दोनों देशों के बीच संवाद और विश्वास बहाली को बढ़ावा मिल सकता है।
भारत और चीन के बीच कूटनीतिक गतिविधियां
हाल के महीनों में भारत और चीन के बीच कूटनीतिक गतिविधियों में भी तेजी आई है। चीन के विशेष दूत झाई जुन ने हाल ही में नई दिल्ली का दौरा किया और भारतीय अधिकारियों के साथ विभिन्न वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा की। दोनों पक्षों ने संवाद बनाए रखने और सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके अलावा, ऐसी खबरें भी हैं कि चीन के विदेश मंत्री वांग यी भी निकट भविष्य में भारत का दौरा कर सकते हैं। इस तरह की उच्चस्तरीय यात्राएं आमतौर पर शीर्ष नेताओं की यात्रा का मार्ग प्रशस्त करती हैं। हालांकि, इन सकारात्मक संकेतों के बावजूद कई चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद पूरी तरह सुलझा नहीं है और LAC के कुछ क्षेत्रों में तनाव अभी भी मौजूद है। कुछ स्थानों पर सैनिकों की वापसी (disengagement) जरूर हुई है, लेकिन स्थायी समाधान अभी दूर है। विशेषज्ञों का कहना है कि संबंधों में सुधार धीरे-धीरे और सावधानीपूर्वक ही संभव होगा।
इसके साथ ही, दोनों देश इस बात को भी समझते हैं कि स्थिर संबंध उनके व्यापक रणनीतिक हितों के लिए जरूरी हैं। भारत और चीन दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में शामिल हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। दोनों देशों के बीच सहयोग व्यापार, जलवायु परिवर्तन, क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक शासन जैसे मुद्दों पर असर डाल सकता है।
शी जिनपिंग की भारत यात्रा
शी जिनपिंग की संभावित यात्रा का एक प्रतीकात्मक महत्व भी है। यदि वे भारत आते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुलाकात करते हैं, तो यह दोनों देशों की ओर से रिश्तों को सुधारने की इच्छा का स्पष्ट संकेत होगा। यह कदम 2020 के बाद पैदा हुए तनाव को कम करने और संबंधों को नई दिशा देने में मदद कर सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि भारत और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा भविष्य में भी बनी रहेगी, क्योंकि दोनों के रणनीतिक हित कई क्षेत्रों में टकराते हैं। लेकिन इसके साथ ही यह भी स्पष्ट हो रहा है कि कुछ क्षेत्रों में सहयोग आवश्यक है। ब्रिक्स जैसे मंच इस संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह भारत–चीन संबंधों में एक नई शुरुआत का संकेत हो सकती है। हालांकि सीमा विवाद जैसे मुद्दे अभी भी प्रमुख चुनौती बने हुए हैं, लेकिन बढ़ती बातचीत और कूटनीतिक पहल यह दर्शाती है कि दोनों देश अपने संबंधों को स्थिर करने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह पहल स्थायी सुधार में बदल पाती है या नहीं।