KNEWS DESK- देश में गो संरक्षण और सनातन धर्म की प्रतिष्ठा के मुद्दे को लेकर एक बड़ा आह्वान करते हुए शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने “गो प्रतिष्ठा धर्मयुद्ध” का शंखनाद किया है। उन्होंने घोषणा की कि धर्म और परंपराओं की रक्षा के लिए “शंकराचार्य चतुरंगिणी सेना” का गठन किया जाएगा। इस सेना का उद्देश्य संत समाज में बढ़ती अशास्त्रीय प्रवृत्तियों और अधर्म को समाप्त करना तथा सनातन मूल्यों की रक्षा करना होगा।
बुधवार को कांशीराम स्मृति सांस्कृतिक स्थल पर आयोजित एक बड़े कार्यक्रम में देशभर से आए संतों, धर्माचार्यों और गो रक्षकों को संबोधित करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि साधु समाज के भीतर भी कई प्रकार की विकृतियां देखने को मिल रही हैं, जो धर्म की मूल भावना के विरुद्ध हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि धार्मिक समाज में धर्मनिरपेक्ष शपथ का कोई स्थान नहीं है, बल्कि यहां केवल धर्म की शपथ ही मान्य होनी चाहिए।
अपने संबोधन में उन्होंने यह भी कहा कि यदि परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि धर्म और गोमाता की रक्षा के लिए कठोर कदम उठाने पड़ें, तो शस्त्र उठाने से भी परहेज नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म की रक्षा के लिए संन्यासियों और धर्माचार्यों को एकजुट होकर आगे आना होगा।
शंकराचार्य ने अखाड़ा परिषद के कुछ महंतों और साधुओं द्वारा मुख्यमंत्री के समर्थन में दिए गए वक्तव्यों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब कई अखाड़े उनके साथ खड़े नहीं हैं, तो अब समय आ गया है कि धर्म की रक्षा के लिए एक अलग संगठन खड़ा किया जाए। इसी उद्देश्य से “शंकराचार्य चतुरंगिणी सेना” की स्थापना की जाएगी।
उन्होंने यह भी कहा कि किसी संन्यासी या योगी का दोहरा चरित्र नहीं हो सकता। धर्म के मार्ग पर चलने वालों को स्पष्ट और निष्कलंक आचरण रखना चाहिए। प्रयागराज में माघ मेले के दौरान हुई एक घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वेदों का अध्ययन करने वाले बटुकों के साथ जो व्यवहार किया गया, वह अत्यंत दुखद और अनुचित था।
गो संरक्षण के विषय में बोलते हुए शंकराचार्य ने कहा कि केवल कसाई ही हत्यारा नहीं होता, बल्कि गो वध की अनुमति देने वाला और उस पर मौन रहने वाला भी समान रूप से उस पाप का भागीदार होता है। उन्होंने समाज से आह्वान किया कि गोमाता की रक्षा को अपना धार्मिक और नैतिक कर्तव्य समझें।
इस अवसर पर उन्होंने “समग्र गविष्ठि गोयुद्ध यात्रा” शुरू करने की भी घोषणा की। यह यात्रा 3 मई से शुरू होकर 23 जुलाई तक चलेगी। यात्रा का प्रारंभ गोरखपुर से होगा और वहीं इसका समापन भी किया जाएगा। इसके बाद 24 जुलाई को कांशीराम स्मृति स्थल पर एक विशाल सभा आयोजित की जाएगी, जिसमें देशभर के संत और धर्माचार्य शामिल होंगे।
अपने संबोधन के अंत में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि सनातन धर्म में शंकराचार्यों को सर्वोच्च आध्यात्मिक मार्गदर्शक माना जाता है। उन्होंने कहा कि गोमाता की रक्षा के साथ-साथ सनातन धर्म की रक्षा का संकल्प भी पूरे समाज को मिलकर लेना होगा।