KNEWS DESK – देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने बुधवार को एक अहम फैसले में 31 वर्षीय युवक को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह युवक पिछले 12 साल से कोमा जैसी स्थिति में जीवन रक्षक उपकरणों के सहारे जिंदगी जी रहा था। अदालत के आदेश के बाद अब उसकी कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली हटाई जाएगी।
2013 में हादसे के बाद बदल गई जिंदगी
जानकारी के मुताबिक, गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन में रहने वाले 31 वर्षीय हरीश राणा वर्ष 2013 में एक इमारत की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इस हादसे में उनके सिर और कमर में गंभीर चोटें आईं। इसके बाद वह क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित हो गए और उनका शरीर लगभग पूरी तरह निष्क्रिय हो गया।
पिछले 12 वर्षों से हरीश का इलाज देश के कई बड़े अस्पतालों में कराया गया, लेकिन उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। लगातार इलाज और देखभाल के बाद भी वह पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो गए।
हाईकोर्ट से निराशा, सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत
हरीश के माता-पिता ने बेटे की स्थिति को देखते हुए अदालत से इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी थी। हालांकि पिछले साल 8 जुलाई को हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद परिवार ने सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया।
मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति जे. बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने एम्स दिल्ली को निर्देश दिया कि हरीश राणा को उपशामक देखभाल (पैलिएटिव केयर) इकाई में भर्ती कर उपचार बंद करने की प्रक्रिया शुरू की जाए।
मेडिकल रिपोर्ट में हालत बताई गई दयनीय
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में डॉक्टरों की रिपोर्ट का भी अध्ययन किया। डॉक्टरों के प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्ड ने जांच के बाद कहा कि मरीज के ठीक होने की संभावना लगभग नगण्य है। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि मरीज की स्थिति बेहद दयनीय है और इस पर मानवीय दृष्टिकोण से निर्णय लेने की जरूरत है।
इलाज में बिक गया परिवार का मकान
हरीश के पिता अशोक राणा के अनुसार, बेटे के इलाज में परिवार की सारी जमा-पूंजी खर्च हो गई। उन्होंने बताया कि दिल्ली के महावीर एंक्लेव में उनका तीन मंजिला मकान था, जिसे सितंबर 2021 में बेच दिया गया।
पिता का कहना है कि 12 साल से बेटे की सेवा कर रहे हैं, लेकिन अब उनकी उम्र भी बढ़ रही है और आर्थिक स्थिति भी कमजोर हो चुकी है। उन्होंने भावुक होकर कहा कि बेटे के लिए मौत मांगना आसान नहीं है, लेकिन हर दिन उसे इस हालत में देखना भी बेहद पीड़ादायक है।
क्या होती है निष्क्रिय इच्छामृत्यु?
निष्क्रिय इच्छामृत्यु में किसी गंभीर रूप से बीमार या कोमा में पड़े मरीज के जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपचार या उपकरणों को हटा दिया जाता है। इसका उद्देश्य मरीज को जबरन जीवन रक्षक प्रणाली पर रखने के बजाय उसकी गरिमा के साथ प्राकृतिक मृत्यु होने देना होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि डॉक्टरों की रिपोर्ट के अनुसार मरीज को गंभीर बेडसोर और लगातार दर्द का सामना करना पड़ रहा है और उसके ठीक होने की संभावना नहीं के बराबर है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अब इस स्थिति में मानवीय आधार पर कुछ निर्णय लेना जरूरी हो गया है।