डिजिटल डेस्क- बिहार की सियासत में इन दिनों ‘नाम’ और ‘पद’ को लेकर एक ऐसा विवाद खड़ा हो गया है जिसने सत्ता के गलियारों में हलचल मचा दी है। मामला विकास कार्यों का नहीं, बल्कि सरकार द्वारा जारी एक आधिकारिक अधिसूचना का है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या बिहार में रातों-रात उपमुख्यमंत्री का पद कागजों से गायब हो गया है? इस एक मुद्दे ने जेडीयू-बीजेपी गठबंधन और विपक्षी आरजेडी-कांग्रेस के बीच जुबानी जंग को चरम पर पहुँचा दिया है। इस पूरे विवाद की शुरुआत 7 मई, 2026 को मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग द्वारा जारी एक पत्र से हुई। गांधी मैदान में हुए भव्य मंत्रिमंडल विस्तार के बाद जब 32 मंत्रियों के विभागों की सूची सार्वजनिक की गई, तो राजनीतिक पंडितों की नजर एक चौंकाने वाले बदलाव पर पड़ी। इस नई लिस्ट में कद्दावर नेता विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव के नाम तो शामिल थे, लेकिन उनके नाम के आगे ‘उपमुख्यमंत्री’ शब्द नदारद था। हैरानी की बात यह है कि 15 अप्रैल को जब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में इन नेताओं ने शपथ ली थी, तब जारी अधिसूचना में इन्हें स्पष्ट रूप से उपमुख्यमंत्री बताया गया था। अब नई लिस्ट में सिर्फ ‘मंत्री’ शब्द लिखे होने पर विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका मिल गया है।
विपक्ष का तंज: “अपमान या कोई बड़ा खेल?”
आरजेडी प्रवक्ता ऐजाज अहमद ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि यह सरकार अपने ही साथियों के साथ ‘खेला’ कर रही है। उन्होंने सीधा सवाल दागा “आखिर किसके दबाव में उपमुख्यमंत्री का पद हटाकर उन्हें सिर्फ मंत्री बना दिया गया?” वहीं, कांग्रेस प्रवक्ता राजेश राठौड़ ने हमले को और तीखा करते हुए कहा कि भाजपा को जब तक सत्ता की जरूरत थी, उन्होंने जेडीयू नेताओं को डिप्टी सीएम बनाया, लेकिन अब जब पकड़ मजबूत हो गई है, तो जेडीयू के नेताओं को ‘मैनेजर’ की हैसियत में लाकर खड़ा कर दिया गया है।
सत्ता पक्ष की सफाई: “यह केवल तकनीकी प्रक्रिया है”
विपक्ष के इन तीखे हमलों के बीच जेडीयू और बीजेपी ने मोर्चा संभाला है। जेडीयू प्रवक्ता हिमराज राम ने सफाई देते हुए कहा कि उपमुख्यमंत्री के रूप में दोनों नेताओं का नोटिफिकेशन पहले ही हो चुका है। वर्तमान पत्र मुख्य रूप से ‘विभागों के बंटवारे’ के लिए था, न कि पद की व्याख्या के लिए। बीजेपी के प्रेम रंजन पटेल ने भी स्थिति साफ की कि मंत्रिमंडल के पूर्ण विस्तार के बाद विभागों की नई सूची जारी करना एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया है। उनके अनुसार, इसमें किसी भी तरह के भ्रम या राजनीतिक रणनीति की कोई जगह नहीं है।