क्या गाली देने पर हो सकती है जेल? सुप्रीम कोर्ट ने साफ किए कानून के नियम

Knews Desk– सड़क पर बहस, पड़ोसियों के बीच विवाद या सोशल मीडिया पर तीखी नोकझोंक के दौरान अक्सर लोग एक-दूसरे को अपशब्द कह देते हैं। आम धारणा है कि सार्वजनिक रूप से गाली देना अपने आप में अपराध है और इसके लिए पुलिस तुरंत कार्रवाई कर सकती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दिए एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि हर गाली या अभद्र भाषा कानून की नजर में अश्लीलता नहीं होती। अदालत ने कहा कि केवल अपशब्द बोल देने से भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 294(b) स्वतः लागू नहीं हो जाती। अपराध तभी माना जाएगा, जब शब्द कानूनी रूप से अश्लील हों और उनके कारण सार्वजनिक स्थान पर लोगों को असुविधा या परेशानी हुई हो।यह मामला तमिलनाडु में वर्ष 2017 के एक जमीन विवाद से जुड़ा था। आरोप के मुताबिक, मणि नाम के व्यक्ति का एक परिवार से विवाद हो गया था। बीच-बचाव करने आए शिकायतकर्ता के साथ उसने कथित तौर पर गाली-गलौज की, जातिसूचक शब्द कहे और बाद में घर से हथियार लाकर हमला कर दिया, जिससे शिकायतकर्ता की नाक की हड्डी टूट गई।निचली अदालत ने आरोपी को IPC की धारा 294(b) (अश्लीलता), धारा 326 (गंभीर चोट पहुंचाना), धारा 506(ii) (आपराधिक धमकी) और SC/ST एक्ट के तहत दोषी ठहराया था। बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने SC/ST एक्ट के आरोपों से उसे राहत दी, लेकिन बाकी धाराओं के तहत सजा बरकरार रखी। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि कानून की दृष्टि में अभद्रता (Vulgarity) और अश्लीलता (Obscenity) एक जैसी नहीं हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल भद्दे या आपत्तिजनक शब्द बोलना अश्लीलता की श्रेणी में नहीं आता। धारा 294(b) तभी लागू होगी, जब इस्तेमाल किए गए शब्द कामुक या यौन प्रकृति के हों, बुरी वासना को बढ़ावा देते हों और लोगों के नैतिक स्तर को प्रभावित करने की क्षमता रखते हों।अदालत ने यह भी कहा कि धारा 294(b) लागू करने के लिए केवल अश्लील शब्द होना पर्याप्त नहीं है। यह भी साबित होना जरूरी है कि घटना सार्वजनिक स्थान पर हुई और वहां मौजूद अन्य लोगों को उन शब्दों से वास्तविक परेशानी या नाराजगी हुई। इस मामले में अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि आरोपी की भाषा से किसी तीसरे व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से कोई असुविधा हुई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक धमकी से जुड़ी धारा 506 को भी हटाते हुए कहा कि झगड़े के दौरान गुस्से में धमकी देना अपने आप में अपराध नहीं बन जाता। अभियोजन को यह साबित करना होगा कि आरोपी का वास्तविक उद्देश्य सामने वाले व्यक्ति को डराना, धमकाना या किसी काम के लिए मजबूर करना था।हालांकि अदालत ने आरोपी को गंभीर चोट पहुंचाने के मामले में दोषी माना। शिकायतकर्ता की नाक की हड्डी टूटने के कारण IPC की धारा 326 के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी गई। लेकिन आरोपी की 70 वर्ष की उम्र और स्वास्थ्य

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