Knews Desk- सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हो रहे जस्टिस संजय करोल ने अपने विदाई समारोह में न्यायपालिका की जिम्मेदारियों और न्यायाधीशों के कर्तव्यों पर महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश भगवान नहीं होते और उनसे हर फैसला पूरी तरह सही होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। उनके मुताबिक, एक न्यायाधीश के लिए कानून की समझ के साथ-साथ विनम्रता और संवेदनशीलता भी बेहद जरूरी है।
जस्टिस करोल ने कहा कि न्याय करने का मतलब केवल यह तय करना नहीं है कि कानून के हिसाब से कौन सही और कौन गलत है। न्यायाधीश को उस व्यक्ति की परिस्थितियों और उसकी उम्मीदों को भी समझना चाहिए, जो अपनी समस्या लेकर अदालत पहुंचा है। उन्होंने कहा कि संविधान न्यायाधीशों से कानून को सिर्फ सही तरीके से लागू करने की नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण तरीके से लागू करने की अपेक्षा करता है।
याचिकाकर्ता के पीछे इंसान को देखना जरूरी
जस्टिस करोल ने कहा कि अदालत में आने वाले व्यक्ति को सिर्फ एक याचिकाकर्ता या केस नंबर के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। किसी याचिका में दर्ज तथ्य यह पूरी तरह नहीं बता सकते कि उस व्यक्ति ने क्या खोया है और वह अदालत से किस उम्मीद के साथ आया है। इसलिए न्यायाधीश के भीतर मानवीय संवेदनशीलता और विनम्रता होना आवश्यक है।
विदाई संबोधन में जस्टिस करोल ने अदालत में कही जाने वाली बातों के अलावा उन भावनाओं को समझने पर भी जोर दिया, जो शब्दों में व्यक्त नहीं हो पातीं। उन्होंने कहा कि कोर्टरूम में कई बार खामोशियां भी बहुत कुछ कहती हैं और न्यायाधीशों को उन संकेतों को समझने की कोशिश करनी चाहिए।
40 साल के कानूनी सफर को किया याद
अपने करीब चार दशक लंबे कानूनी सफर को याद करते हुए जस्टिस करोल ने कहा कि अदालत उनके लिए कभी सिर्फ एक कार्यस्थल नहीं रही। उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा कोर्टरूम में बिताया। शुरुआत उन्होंने वकील के तौर पर की थी और करीब 19 वर्षों तक न्यायाधीश के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाई।
आम नागरिक का भरोसा ही अदालत की असली ताकत
जस्टिस करोल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की सबसे बड़ी ताकत उस आम नागरिक का भरोसा है, जो यह उम्मीद लेकर अदालत पहुंचता है कि उसकी बात सुनी जाएगी और उसे न्याय मिलेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे लोगों को नहीं भूलना चाहिए जो न्याय को महंगा, दूर या डराने वाला मानकर अदालत तक पहुंच ही नहीं पाते।
उन्होंने न्यायाधीश के कर्तव्य को ‘धर्म’ की अवधारणा से जोड़ते हुए कहा कि यहां धर्म का मतलब किसी धार्मिक अनुष्ठान से नहीं, बल्कि कर्तव्य से है। न्यायाधीश का दायित्व है कि वह न्याय का सम्मान करे और यह सुनिश्चित करे कि अदालत के सामने आने वाला हर व्यक्ति, चाहे वह कितना भी कमजोर या साधारण क्यों न हो, उसे सुना और समझा जाए।