2700 रुपये की दवा 27 हजार में बेचने पर लग सकती है रोक, सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी बनाने का दिया आदेश

दवाओं की कीमतों में भारी अंतर और डॉक्टरों को महंगे तोहफे देने जैसी गतिविधियों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को विशेषज्ञ समिति गठित कर दवा कंपनियों की मार्केटिंग प्रथाओं को नियंत्रित करने के लिए कानूनी नियमों पर सिफारिशें तैयार करने का निर्देश दिया है।

Knews Desk– सुप्रीम कोर्ट ने महंगी दवाओं और फार्मा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग को लेकर केंद्र सरकार को विशेषज्ञ समिति गठित करने का आदेश दिया है। यह समिति दवा कंपनियों की मार्केटिंग के तरीकों को नियंत्रित करने के लिए वैधानिक नियम बनाए जाने को लेकर अपनी सिफारिशें देगी। अदालत ने दवाओं की ऊंची कीमतों और डॉक्टरों को महंगे उपहार देकर विशेष दवाएं लिखवाने जैसी गतिविधियों पर चिंता जताई है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने केंद्र सरकार को इस विशेषज्ञ समिति का गठन करने का निर्देश दिया। समिति दवा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग प्रथाओं पर रोक लगाने के लिए कानूनी प्रावधानों का सुझाव देगी। इसके तहत डॉक्टरों को महंगे गिफ्ट, विदेश यात्राएं, हॉस्पिटैलिटी और अन्य आर्थिक लाभ देने जैसी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए सख्त नियमों का खाका तैयार किया जाएगा।

समिति इस मुद्दे पर आम जनता, विशेषज्ञों और संबंधित संस्थाओं से सुझाव और आपत्तियां भी लेगी। इसके बाद वह अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अब तक की गई कार्रवाई के संबंध में अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी 2027 को होगी। उस दौरान सरकार को समिति के गठन और नियम तैयार करने की दिशा में हुई प्रगति की जानकारी अदालत को देनी होगी।

इससे पहले सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं के खरीद मूल्य और अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच बड़े अंतर पर चिंता जताई थी। अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा था कि किसी दवा को रिटेलर को 2,700 रुपये में दिया जाता है, जबकि उसकी MRP 27,000 रुपये रखी जाती है। पीठ ने इस तरह के 10 गुना अंतर को आम जनता और मरीजों के साथ दिनदहाड़े डकैती जैसा बताया था।

कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी सवाल किया था कि आवश्यक और जीवनरक्षक दवाओं, खासकर कैंसर की दवाओं, पर मुनाफे के मार्जिन को Drugs (Prices Control) Order, 2013 के तहत 16 फीसदी तक सीमित क्यों नहीं किया जा सकता।

यह मामला फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशंस ऑफ इंडिया (FMRAI) की ओर से दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि दवा कंपनियां बिक्री बढ़ाने के लिए डॉक्टरों पर दबाव डालती हैं और उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देती हैं। इसके चलते डॉक्टरों द्वारा मरीजों को महंगी और गैर-जरूरी ब्रांडेड दवाएं लिखे जाने का आरोप है। याचिका में इसे नागरिकों के ‘राइट टू हेल्थ’ यानी स्वास्थ्य के अधिकार के उल्लंघन से जोड़ा गया है।

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