Knews Desk: देश में जहां ज्यादातर लोग रोजाना दूध खरीदते हैं, वहीं तेलंगाना का एक गांव ऐसा भी है जहां दूध खरीदने या बेचने की परंपरा ही नहीं है। आदिलाबाद जिले के पोट्टमलोड्डी गांव में दूध को कारोबार का जरिया बनाने के बजाय जरूरतमंद लोगों के साथ साझा किया जाता है।
आदिलाबाद के ग्रामीण मंडल की अल्लिकोरी पंचायत में बसे इस गांव में करीब 50 परिवार रहते हैं। खास बात यह है कि इतने छोटे गांव में 250 से ज्यादा गाय और बकरियां हैं। ग्रामीण इन पशुओं को केवल कमाई का साधन नहीं मानते, बल्कि परिवार का हिस्सा समझकर उनकी देखभाल करते हैं।
तीन चरवाहे संभालते हैं मवेशी
गांव के सभी मवेशियों की देखभाल और उन्हें चराने के लिए तीन चरवाहे नियुक्त किए गए हैं। वे रोजाना सुबह पशुओं को लेकर चराने निकलते हैं और शाम को उन्हें वापस गांव लेकर आते हैं। यही यहां की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है।
पोट्टमलोड्डी की सबसे खास परंपरा दूध को लेकर है। घर में जरूरत से ज्यादा दूध होने पर ग्रामीण उसे बाजार में बेचने या किसी डेयरी सेंटर तक पहुंचाने के बजाय जरूरतमंद परिवारों को दे देते हैं। अगर किसी दूसरे घर में भी अतिरिक्त दूध बचता है, तो वह भी इसी तरह बांट दिया जाता है।
पैकेट वाले दूध से आज भी दूर
गांव के लोगों का कहना है कि उन्हें बाहर से दूध खरीदने की जरूरत ही नहीं पड़ती। पशुओं से मिलने वाला दूध उनकी घरेलू जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त है। इसी वजह से गांव में लोगों ने कभी बाहर से पैकेट वाला दूध खरीदने की जरूरत महसूस नहीं की।
जहां आज दूध एक बड़े कारोबार का हिस्सा बन चुका है, वहीं पोट्टमलोड्डी में इसे जरूरतमंदों के साथ साझा करने की परंपरा आज भी कायम है। पशुओं के प्रति लगाव और आपसी सहयोग की यह मिसाल गांव को बाकी जगहों से अलग बनाती है।