Knews Desk– जिंदगी में मुश्किल हालात इंसान को तोड़ सकते हैं, लेकिन कुछ लोग इन्हीं चुनौतियों को अपनी ताकत बनाकर नई मिसाल कायम करते हैं। भारतीय पैरा आर्चर टोमन कुमार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। कभी छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाने वाले टोमन आज खेलों की दुनिया में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीत रहे हैं। पैरा एशियन गेम्स 2026 में उन्होंने शीतल देवी के साथ मिलकर मिक्स्ड पैरा आर्चरी इवेंट में गोल्ड मेडल अपने नाम किया।जापान के आइची-नागोया में आयोजित पैरा एशियन गेम्स के पांचवें दिन, गुरुवार 22 अक्टूबर को भारतीय जोड़ी ने इंडोनेशिया के तेओडोरा ऑडी आयुडिया फेरेली और केन स्वागुमिलंग को 151-148 के स्कोर से हराया। टॉप सीड भारतीय टीम ने शुरुआत से ही मुकाबले में बढ़त बनाए रखी और तीन अंकों के अंतर से जीत दर्ज की। यह पैरा एशियन गेम्स 2026 में भारत का 16वां गोल्ड मेडल है। इस जीत के साथ भारत ने पदक तालिका में चौथा स्थान हासिल किया। वहीं, पैरा आर्चरी में यह भारत का इस साल का पहला स्वर्ण पदक है।
टोमन कुमार और शीतल देवी ने फाइनल से पहले भी शानदार प्रदर्शन किया था। दोनों ने क्वालिफिकेशन राउंड में 1,402 अंक हासिल कर नया विश्व रिकॉर्ड बनाया। यह स्कोर पिछले रिकॉर्ड से दो अंक अधिक था। शीतल देवी जम्मू-कश्मीर से आती हैं और उनका जन्म बिना हाथों के हुआ था। वह अपने पैरों और टांगों की मदद से कंपाउंड धनुष संभालती हैं और कंधे तथा जबड़े का इस्तेमाल करके धनुष की डोरी खींचती और छोड़ती हैं।टोमन कुमार की कहानी भी संघर्ष और हिम्मत की मिसाल है। छत्तीसगढ़ के रहने वाले टोमन साल 2017 में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की कोबरा (CoBRA) कमांडो बटालियन में भर्ती हुए थे। यह बटालियन नक्सल विरोधी अभियानों में तैनात रहती है। टोमन ने भी देश की सुरक्षा के लिए कई चुनौतियों का सामना किया।
साल 2021 में एक ऑपरेशन के दौरान टोमन IED धमाके की चपेट में आ गए। इस विस्फोट में उनका एक पैर बुरी तरह जख्मी हो गया और आखिरकार उन्हें अपना पैर गंवाना पड़ा। इस हादसे ने उनकी जिंदगी बदल दी। दुर्घटना के बाद वह कुछ समय तक डिप्रेशन में भी रहे, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय खुद को दोबारा खड़ा करने की कोशिश की।हैदराबाद में कृत्रिम पैर लगवाने के दौरान टोमन ने अपने जैसे कई लोगों को देखा। इससे उन्हें नई जिंदगी शुरू करने की प्रेरणा मिली। राइफल चलाने में माहिर रहे टोमन ने इसके बाद धनुष-बाण थाम लिया और तीरंदाजी को अपना जुनून बना लिया। लगातार मेहनत और अभ्यास के दम पर उन्होंने पैरा आर्चरी में अपनी अलग पहचान बनाई। वह नंबर-1 रैंक हासिल करने के साथ विश्व चैंपियन भी बने। अब पैरा एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर उन्होंने साबित कर दिया है कि किसी हादसे से जिंदगी की दिशा बदल सकती है, लेकिन मजबूत इरादे इंसान को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकते हैं।