सोमनाथ अमृत पर्व: 75 साल बाद फिर इतिहास दोहराएगा प्रभास पाटन, क्या है 90 मीटर ऊंचे शिखर और चंद्रदेव के श्राप का रहस्य?

डिजिटल डेस्क- आज से ठीक 75 साल पहले, 11 मई 1951 को आधुनिक भारत में सोमनाथ मंदिर का पुनरुद्धार हुआ था। आज उसी पावन अवसर को ‘सोमनाथ अमृत पर्व’ के रूप में मनाया जा रहा है। इस विशेष आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं शामिल हो रहे हैं। इस पर्व का सबसे बड़ा आकर्षण मंदिर का 90 मीटर ऊंचा विशाल शिखर है, जिसका कुंभाभिषेक देश के 11 अति-पवित्र तीर्थों से लाए गए जल से किया जाएगा। गुजरात के वेरावल तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर को भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है। ‘सोमनाथ’ का अर्थ है ‘सोम के नाथ’ यानी चंद्रमा के स्वामी। शिव पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, यह स्थान सदियों से दिव्य ऊर्जा का केंद्र रहा है। मान्यता है कि यहाँ महादेव ज्योति स्वरूप में साक्षात विराजमान हैं और इनके दर्शन मात्र से भक्तों के जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश हो जाता है।

चंद्रदेव और दक्ष प्रजापति का पौराणिक सस्पेंस

सोमनाथ की स्थापना के पीछे एक गहरा रहस्य छिपा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, चंद्रदेव का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियों (नक्षत्रों) से हुआ था। लेकिन चंद्रमा केवल रोहिणी से ही प्रेम करते थे। अपनी अन्य पुत्रियों के दुख को देखकर क्रोधित दक्ष प्रजापति ने चंद्रदेव को ‘क्षय’ (अंधेरे और विनाश) का श्राप दे दिया। इस श्राप के कारण चंद्रमा का तेज खत्म होने लगा और वे मृत्यु के कगार पर पहुँच गए।

कठोर तपस्या और महादेव का वरदान

पूरी सृष्टि को संकट में देख ब्रह्मा जी ने चंद्रमा को प्रभास क्षेत्र में महादेव की आराधना करने की सलाह दी। चंद्रदेव ने यहाँ शिवलिंग की स्थापना की और कई वर्षों तक महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया। चंद्रमा की भक्ति से प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए। चूँकि दक्ष का श्राप निष्फल नहीं हो सकता था, इसलिए शिव ने चंद्रमा को वरदान दिया कि वे 15 दिन घटेंगे और 15 दिन बढ़ेंगे। इस तरह चंद्रमा को नया जीवन मिला और वे सदा के लिए महादेव की शरण में आ गए।

बाण स्तंभ का अनसुलझा रहस्य

सोमनाथ मंदिर की केवल कथा ही नहीं, बल्कि इसकी बनावट भी अद्भुत है। यहाँ स्थित ‘बाण स्तंभ’ प्राचीन भारतीय विज्ञान का एक बड़ा चमत्कार है। इस स्तंभ पर लिखा है कि यहाँ से दक्षिण ध्रुव तक समुद्र के बीच में कोई भी भूखंड नहीं है। हजारों साल पहले हमारे ऋषियों को यह खगोलीय ज्ञान कैसे था, यह आज भी आधुनिक वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ा सस्पेंस बना हुआ है। सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान की कहानी है। आक्रमणकारियों ने इसे कई बार नष्ट किया, लेकिन हर बार महादेव के भक्तों ने इसे और अधिक भव्यता के साथ खड़ा किया। आज का ‘अमृत पर्व’ इसी अजेय आस्था और अटूट विश्वास का उत्सव है, जो यह बताता है कि सत्य और शिव को कभी मिटाया नहीं जा सकता।

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