Knews Desk- बुद्ध पूर्णिमा का पर्व गौतम बुद्ध के जीवन के तीन महत्वपूर्ण पड़ाव जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण का स्मरण कराता है। यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि मानवता को सत्य, अहिंसा और करुणा का संदेश देने वाला दिन भी है। वर्ष 2026 में यह पावन अवसर बुद्ध की 2588वीं जयंती के रूप में मनाया जा रहा है। वैशाख पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला यह पर्व आध्यात्मिक जागरूकता और आत्मचिंतन का प्रतीक है।
बुद्ध पूर्णिमा कथा

कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन और रानी माया देवी के यहाँ सिद्धार्थ का जन्म हुआ। बचपन से ही उन्हें संसार के दुखों से दूर रखा गया, लेकिन एक दिन उन्होंने चार दृश्य देखे एक वृद्ध, एक रोगी, एक मृत व्यक्ति और एक सन्यासी। इन दृश्यों ने उनके मन में गहरा प्रभाव डाला और उन्हें जीवन के सत्य की खोज के लिए प्रेरित किया। उन्होंने राजमहल त्याग दिया और कठोर तपस्या में लीन हो गए।
कई वर्षों की साधना के बाद बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। तभी वे सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध बन गए। इसके बाद उन्होंने चार आर्य सत्य और अष्टांग मार्ग का उपदेश दिया, जो आज भी जीवन को सरल, संतुलित और शांत बनाने का मार्ग दिखाते हैं। बुद्ध पूर्णिमा के दिन श्रद्धालु पूजा, ध्यान और दान-पुण्य करते हैं। माना जाता है कि इस दिन बुद्ध की कथा पढ़ने और उनके उपदेशों का पालन करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और दुखों का नाश होता है। यह दिन हमें लोभ, क्रोध और अहंकार से दूर रहने की प्रेरणा देता है।
प्रमुख तीर्थ स्थल
गौतम बुद्ध से जुड़े प्रमुख तीर्थ स्थलों में लुम्बिनी, सारनाथ और कुशीनगर विशेष महत्व रखते हैं। लुम्बिनी उनका जन्मस्थल है, बोधगया ज्ञान प्राप्ति का स्थान, सारनाथ पहला उपदेश स्थल और कुशीनगर महापरिनिर्वाण का स्थल माना जाता है। अंततः, बुद्ध पूर्णिमा हमें यह सिखाती है कि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और संतुलन में निहित है।