ग्राउंड ज़ीरो पर सरकार, विपक्ष का वार !

उत्तराखंड डेस्क रिपोर्ट, देवभूमि उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड की सियासत में नया प्रयोग देखने को मिल रहा है। जहाँ धामी सरकार ने कैबिनेट की बैठक को सचिवालय से निकालकर सीधे जिलों और सीमांत क्षेत्रों में ले जाने का फैसला किया है। राजनीतिक तौर पर इसे सरकार का बड़ा दांव माना जा रहा है। जिसकी शुरुआत मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के गृह जिले चंपावत के बनबसा से 4 अक्टूबर को हो चुकी है। अब सरकार की अगली कैबिनेट आज 12 अक्टूबर को हरिद्वार में की गई है। राज्य सरकार कहती नज़र आ रही है कि अब फैसले एसी कमरों में नहीं बल्कि ग्राउंड जीरो पर होंगे। इसके साथ ही जन -जन की सरकार, जन-जन के द्वार कहलाये जाने वाली छवि भाजपा सरकार की बनी रहे। दावा किया जा रहा है कि इस पहल से सीमांत के आखिरी गांव तक विकास पहुंचेगा। वाइब्रेंट विलेज योजना के तहत बॉर्डर क्षेत्रों में सड़क, बिजली, पानी और कनेक्टिविटी मजबूत होगी, पलायन रुकेगा और बॉर्डर टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा। दूसरा फायदा ये है कि जिस जिले में कैबिनेट होगी वहां के स्थानीय विधायक अपनी विधानसभा की समस्याओं को सीधे मुख्यमंत्री और मंत्रियों के सामने रख सकेंगे। इससे सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसे मुद्दों पर तुरंत चर्चा और समाधान की उम्मीद बढ़ जाती है। वही विपक्ष सरकार के इस कदम को चुनावी रणनीति बता रहा है और सवाल उठा रहा है, कि अलग अलग जगह कैबिनेट बैठकों का औचित्य क्या हैं। ऐसे में क्या सरकार के इस कदम से वाकई विकास होगा या ये सिर्फ जनता को लुभाने का प्रयास है जैसे विषय उठने लगे है। जिसके चलते आपसी बयानबाज़ी चरम पर देखी जा रही हैं।

प्रदेश की धामी सरकार ने जन जन की सरकार, जन जन के द्वार दावे को एक बार फिर धरातल पर अलग रूप में उतारा हैं। साल की शुरुआत में जहाँ यह दावा सेवा शिविरो के माध्यम से किया जा रहा था वही अब धामी सरकार बड़े लेवल में इस दावे को जनता के बीच पहुचानें में जुट गई है। जिसके चलते धामी सरकार कैबिनेट को अब पहाड़ और मैदान तक ले जा रही है। 2027 चुनाव से पहले सरकार ने राजधानी से निकलकर जिलों में कैबिनेट करने का दांव चला है। पहली बैठक चंपावत के बनबसा में हुई, तो आज यह बैठक हरिद्वार में की गई है। सरकार का कहना है जनता के बीच बैठकर फैसले लिए जाएंगे, इससे स्थानीय समस्याओं का मौके पर समाधान होगा और सीमांत गांवों में विकास की योजनाएं तेजी से पहुंचेंगी। वही विपक्षी दलों का आरोप है कि अगर सरकार को जिलों में कैबिनेट करनी ही थी तो पांच साल के कार्यकाल में हर साल एक बैठक करनी चाहिए थी। अब चुनाव आते ही इस प्रकार के निर्णय से असली जनता के मुद्दों से ध्यान भटकने  की कोशिश की जा रही है जो निरर्थक साबित होगी। जिस बीच सियासी बयानबाज़ी तेज़ हो गई हैं।

कुल मिलाकर, धामी सरकार का कैबिनेट को देहरादून से निकालकर अन्य जिलों और सीमांत क्षेत्रों में ले जाना 2027 से पहले का सबसे बड़ा सियासी दांव माना जा रहा है। सरकार व सत्ता पक्ष इसे विकास का नया मॉडल बता रहा है, जहां सचिवालय की फाइलें ग्राउंड जीरो पर उतरेंगी और आखिरी गांव तक कनेक्टिविटी, सड़क और बुनियादी सुविधाएं पहुंचेंगी। वहीं स्थानीय विधायकों के लिए भी ये अपने क्षेत्र के मुद्दे सीधे कैबिनेट में रखने का सुनहरा मौका है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या ये पहल वाकई पलायन रोककर बॉर्डर टूरिज्म को बढ़ावा दे पाएगी या फिर विपक्ष के आरोपों की तरह ये सिर्फ चुनावी तैयारी तक ही सीमित रह जाएगी। इसका जवाब आने वाले समय में अन्य जिलों में बैठके करने के बाद होने वाले फैसलों से ही तय होगा जिसपर सभी की नज़रे टिकी दिखाई दे रही है।

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