योगी कैबिनेट में कृष्णा पासवान की एंट्री…. 2027 के लिए दलित किला फतह करने की बड़ी तैयारी

शिव शंकर सविता- उत्तर प्रदेश में योगी सरकार का हालिया मंत्रिमंडल विस्तार केवल प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि यह 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए बुनी गई एक गहरी राजनीतिक बिसात है। इस विस्तार में कृष्णा पासवान को शामिल करना मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का एक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। चार बार की विधायक और जमीनी संघर्ष से उभरीं कृष्णा पासवान को मंत्री बनाकर भाजपा ने विपक्ष के ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले की काट ढूंढने की कोशिश की है। कृष्णा पासवान का राजनीतिक सफर अत्यंत प्रेरणादायी रहा है। उन्होंने एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के रूप में अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की और अपनी मेहनत के दम पर चार बार विधानसभा तक का सफर तय किया। उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका पासवान (दुसाध) समुदाय से होना है। पूर्वांचल और मध्य उत्तर प्रदेश के कई जिलों में इस समुदाय का वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता है। भाजपा ने उन्हें मंत्री बनाकर न केवल इस बड़े वोट बैंक को सीधा संदेश दिया है, बल्कि एक अनुभवी और जुझारू महिला चेहरे को कैबिनेट में जगह देकर संगठन के प्रति निष्ठा का सम्मान भी किया है।

विपक्ष की ‘पीडीए’ रणनीति पर कड़ा प्रहार

आगामी 2027 के चुनावों को देखते हुए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जिस तरह से दलित और पिछड़ों को अपने पाले में करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं, कृष्णा पासवान की नियुक्ति उसे सीधे तौर पर चुनौती देती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने यह कदम इसलिए उठाया है ताकि मायावती के कमजोर पड़ने के बाद जो दलित वोट बैंक छिटक रहा है, उसे ‘कमल’ के साथ जोड़ा जा सके। कृष्णा पासवान को बड़ी जिम्मेदारी देकर भाजपा ने यह साबित करने की कोशिश की है कि वह दलितों के सशक्तीकरण के प्रति गंभीर है और उनके पास हर वर्ग का नेतृत्व करने वाले चेहरे मौजूद हैं।

2027 में भाजपा को होने वाले संभावित लाभ

कृष्णा पासवान को मंत्री बनाए जाने से भाजपा को चुनावी मैदान में कई स्तरों पर लाभ मिलने की उम्मीद है। सबसे पहले, यह मध्य यूपी और पूर्वांचल के उन क्षेत्रों में भाजपा की स्थिति मजबूत करेगा जहाँ पिछले चुनावों में विपक्षी दलों ने बढ़त बनाई थी। दूसरा, महिला सशक्तिकरण के प्रतीक के रूप में उनकी उपस्थिति ‘आधी आबादी’ के बीच भाजपा की पकड़ को और पुख्ता करेगी। तीसरा, पासवान समुदाय में उनके प्रभाव का उपयोग करके भाजपा विपक्षी गठबंधन के जातीय समीकरणों को ध्वस्त कर सकती है।

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