मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतों में बिहार तीसरे नंबर पर, पुलिस के खिलाफ 35,902 मामले; UP और दिल्ली की स्थिति भी जानिए

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में वर्ष 1993 से अब तक बिहार से 1.22 लाख से अधिक शिकायतें दर्ज हुई हैं। इनमें पुलिस के खिलाफ सबसे ज्यादा 35,902 शिकायतें शामिल हैं। महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध के साथ हिरासत में मौत के मामले भी सामने आए हैं। शिकायतों की संख्या के लिहाज से उत्तर प्रदेश पहले, दिल्ली दूसरे और बिहार तीसरे स्थान पर है।

Knews Desk– बिहार में कानून-व्यवस्था और सुशासन को लेकर किए जाने वाले दावों के बीच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के आंकड़े कई अहम सवाल खड़े करते हैं। आयोग में राज्य से मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित कुल 1,22,954 शिकायतें दर्ज की गई हैं। इनमें से 1,20,551 मामलों का निपटारा हो चुका है, जबकि 2,403 मामले अब भी लंबित हैं। आंकड़ों में पुलिस के खिलाफ शिकायतों की संख्या सबसे अधिक है। इसके अलावा महिलाओं के उत्पीड़न, बच्चों के खिलाफ अपराध और हिरासत में मौत से जुड़े मामले भी दर्ज हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर शिकायतों की संख्या के मामले में उत्तर प्रदेश 11.88 लाख से अधिक शिकायतों के साथ पहले स्थान पर है। वहीं, दिल्ली में करीब 1.69 लाख शिकायतें दर्ज की गई हैं और वह दूसरे नंबर पर है। बिहार तीसरे स्थान पर है। हालांकि, ये आंकड़े आयोग में दर्ज शिकायतों की संख्या दर्शाते हैं। इन्हें राज्यों में मानवाधिकार उल्लंघन की प्रमाणित घटनाओं की दर के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

बिहार में दर्ज शिकायतों में सबसे बड़ा हिस्सा पुलिस से संबंधित मामलों का है। पुलिस के खिलाफ कुल 35,902 शिकायतें आयोग तक पहुंचीं। इनमें से 35,285 मामलों का निपटारा किया गया, जबकि 617 मामले लंबित हैं। यह आंकड़ा पुलिस की कार्यप्रणाली, शिकायतों पर कार्रवाई और नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े सवालों को सामने लाता है।

महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित शिकायतों की संख्या भी काफी अधिक है। महिलाओं के उत्पीड़न, दुष्कर्म और अन्य अपराधों से जुड़े कुल 8,899 मामले दर्ज किए गए। इनमें से 8,716 मामलों का निपटारा हो चुका है, जबकि 183 मामले लंबित हैं। इन आंकड़ों के बीच पीड़ित महिलाओं को समय पर न्याय, सुरक्षा और कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की आवश्यकता महत्वपूर्ण बनी हुई है।

बच्चों के खिलाफ अपराध से जुड़े 1,891 मामले भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में दर्ज किए गए। इनमें से 1,730 मामलों का निपटारा किया गया, जबकि 161 मामले लंबित हैं। बच्चों से संबंधित मामलों में त्वरित जांच, सुरक्षा और समय पर हस्तक्षेप को विशेष महत्व दिया जाता है।

हिरासत में मौत के आंकड़े रिपोर्ट के गंभीर पहलुओं में शामिल हैं। बिहार में जेल हिरासत के दौरान 4,311 मौतों के मामले दर्ज किए गए। इनमें से 4,151 मामलों का निपटारा हो चुका है और 160 मामले लंबित हैं। वहीं, पुलिस लॉकअप में मौत से जुड़े 238 मामले सामने आए। इनमें 217 मामलों का निपटारा किया गया, जबकि 21 लंबित हैं। शेल्टर होम और सुधार गृहों में मौत से संबंधित 19 मामले दर्ज हुए, जिनमें 15 का निपटारा किया गया और चार मामले अब भी लंबित हैं।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन ने जेल और पुलिस लॉकअप में होने वाली मौतों को मानवाधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय बताया। ऐसे मामलों में मौत की परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच, जिम्मेदारी तय करना और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाना आवश्यक है।

जिलावार आंकड़ों में पटना सबसे आगे है। राजधानी में अब तक 12,792 शिकायतें दर्ज की गईं, जिनमें से 12,490 का निपटारा हुआ और 302 मामले लंबित हैं। मुजफ्फरपुर में 7,925 शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें 7,681 का निपटारा किया गया। समस्तीपुर में 6,868 शिकायतें दर्ज की गईं और 6,744 मामलों का निपटारा हुआ। गया जी में भी 6,728 शिकायतें दर्ज होने की जानकारी दी गई है।

मानवाधिकार से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए पटना के ज्ञान भवन में 7 और 8 अक्टूबर को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की विशेष सुनवाई आयोजित की गई थी। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, सुनवाई के दौरान 70 मामलों में से 65 का निपटारा किया गया। साथ ही, पीड़ितों और उनके आश्रितों को कुल 1.50 करोड़ रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया गया।

इन मामलों में नौबतपुर के सचिन की बेऊर जेल में हुई मौत का प्रकरण भी शामिल था। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब तीन साल पहले सचिन की तबीयत बिगड़ने के बावजूद समय पर इलाज नहीं मिलने का आरोप सामने आया था। आयोग ने उनके आश्रितों को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। यह मामला जेल में बंद लोगों को समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने की जरूरत को रेखांकित करता है।

बिहार में मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित शिकायतों की बड़ी संख्या प्रशासन के सामने चुनौती पेश करती है। पुलिस के खिलाफ हजारों शिकायतें, महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामले तथा हिरासत में मौत की घटनाएं जवाबदेही और प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता को सामने लाती हैं। हालांकि, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष ने यह भी कहा कि बिहार में पहले की तुलना में मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में कमी आई है और शिकायतों के निपटारे की प्रक्रिया में तेजी आई है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *