शरद पवार और अजित पवार गुटों के एक साथ आने की चर्चाओं के बीच बारामती सीट को लेकर परिवार के अंदर खींचतान तेज हो गई है। क्या तीसरी पीढ़ी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा फिर से NCP की एकता में रोड़ा बन रही है?
Knews Desk- महाराष्ट्र की राजनीति में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के दोनों गुटों के संभावित विलय को लेकर लंबे समय से अटकलें लगती रही हैं। शरद पवार के नेतृत्व वाला NCP (SP) और अजित पवार गुट के बीच कई मौकों पर साथ आने के संकेत भी सामने आए, लेकिन अब यह कवायद एक बार फिर मुश्किलों में घिरती नजर आ रही है।
सूत्रों के मुताबिक, विलय की सबसे बड़ी अड़चन पवार परिवार के भीतर बारामती विधानसभा सीट को लेकर सामने आ रही है। कहा जा रहा है कि सुनेत्रा पवार अपने बेटे पार्थ पवार के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करना चाहती हैं, जबकि शरद पवार के पोते रोहित पवार भी इस सीट पर अपनी दावेदारी को मजबूत करने में जुटे हैं।
बारामती सीट बनी पवार परिवार की सियासी जंग का केंद्र
बारामती विधानसभा क्षेत्र दशकों से पवार परिवार की राजनीतिक पहचान का केंद्र रहा है। अजित पवार इस सीट से लंबे समय तक विधायक रहे। उनके निधन के बाद अब इस सीट को लेकर परिवार की अगली पीढ़ी के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ती दिखाई दे रही है।
सुनेत्रा पवार चाहती हैं कि बारामती सीट से आगे उनके बेटे पार्थ पवार को मौका मिले। पार्थ इससे पहले मावल लोकसभा सीट से चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। ऐसे में बारामती को उनके राजनीतिक पुनरुत्थान के लिए अहम माना जा रहा है।
दूसरी ओर, रोहित पवार भी पवार परिवार की राजनीतिक विरासत में अपनी मजबूत जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वर्तमान में वह कर्जत-जामखेड से विधायक हैं और शरद पवार गुट के युवा चेहरों में शामिल हैं।
तीसरी पीढ़ी में पहुंची पवार परिवार की राजनीतिक लड़ाई
पवार परिवार में सत्ता और राजनीतिक विरासत को लेकर संघर्ष नया नहीं है। इससे पहले शरद पवार और अजित पवार के बीच मतभेद की बड़ी वजह नेतृत्व और राजनीतिक उत्तराधिकार को लेकर रही थी। उस दौर में सुप्रिया सुले की बढ़ती राजनीतिक भूमिका को लेकर अजित पवार की नाराजगी की बातें सामने आई थीं।
अब यही सियासी खींचतान परिवार की तीसरी पीढ़ी तक पहुंचती नजर आ रही है। पार्थ पवार और रोहित पवार के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने NCP के संभावित विलय को लेकर नई चुनौती खड़ी कर दी है।
क्या परिवार की महत्वाकांक्षाएं रोक रही हैं NCP की एकता?
NCP के कई नेता और कार्यकर्ता मानते हैं कि दोनों गुटों के अलग-अलग चुनाव लड़ने से पार्टी का जनाधार कमजोर हो रहा है। मराठा वोटों के बंटवारे का असर भी पार्टी की राजनीतिक ताकत पर पड़ सकता है।
इसके बावजूद नेतृत्व स्तर पर सहमति नहीं बन पा रही है। वजह विचारधारा से ज्यादा परिवार के भीतर राजनीतिक भविष्य और सीटों की दावेदारी को माना जा रहा है।
अजित पवार गुट के सामने दोहरी चुनौती
अजित पवार गुट के नेताओं के सामने इस समय मुश्किल स्थिति है। एक तरफ कई नेता संगठन को मजबूत करने और राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करने के लिए शरद पवार के साथ जाने के पक्ष में दिख रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सुनेत्रा और पार्थ पवार अपने राजनीतिक हितों को लेकर पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
लोकसभा चुनाव में बारामती सीट पर सुनेत्रा पवार को सुप्रिया सुले के हाथों हार मिली थी। ऐसे में विधानसभा सीट पर पार्थ की दावेदारी उनके लिए बेहद अहम मानी जा रही है।
विलय नहीं हुआ तो किसे होगा फायदा?
अगर NCP के दोनों गुटों के बीच समझौता नहीं होता है, तो आने वाले चुनावों में दोनों धड़े एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में उतर सकते हैं। इसका फायदा राज्य की दूसरी बड़ी पार्टियों को मिल सकता है।
वहीं, शरद पवार की राजनीतिक पकड़ को देखते हुए कुछ नेता दोबारा उनके खेमे में लौट सकते हैं, जिससे अजित पवार गुट के सामने संगठनात्मक चुनौती बढ़ सकती है।
फिलहाल NCP का विलय सिर्फ दो राजनीतिक गुटों के मिलने का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह पवार परिवार की राजनीतिक विरासत और आने वाली पीढ़ी के भविष्य से भी जुड़ गया है। बारामती सीट को लेकर जारी खींचतान ने इस पूरी कवायद को और जटिल बना दिया है।