Uttar Da Puttar Review: अंधविश्वास पर जोरदार चोट, अनु कपूर की एक्टिंग ने जीता दिल

Knews Desk– इस हफ्ते सिनेमाघरों में रिलीज हुई ‘उत्तर दा पुत्तर’ उन फिल्मों में शामिल है जो बड़े बजट या स्टारडम के दम पर नहीं, बल्कि अपनी कहानी और संदेश के जरिए दर्शकों का ध्यान खींचती हैं। निर्देशक रविंद्र सिवाच की यह कॉमेडी-ड्रामा फिल्म अंधविश्वास, वास्तु, ज्योतिष और भ्रष्टाचार जैसे सामाजिक मुद्दों पर हल्के-फुल्के अंदाज में व्यंग्य करती है। फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष अनु कपूर का अभिनय है, जिन्होंने अपनी शानदार परफॉर्मेंस से कहानी को जीवंत बना दिया है।फिल्म की कहानी साईं राम टुटेजा नाम के एक फिजिक्स प्रोफेसर के इर्द-गिर्द घूमती है। टुटेजा अपने छात्रों को विज्ञान और तर्क की शिक्षा देते हैं, लेकिन निजी जिंदगी में खुद अंधविश्वास और वास्तु के नियमों पर आंख मूंदकर विश्वास करते हैं। शनिवार को काले कपड़े पहनना, हर काम शुभ मुहूर्त देखकर करना और वास्तु दोष से मुक्त घर की तलाश करना उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा उद्देश्य बन जाता है।

कहानी में मोड़ तब आता है जब उनकी पत्नी गिन्नी, जिसका किरदार रुखसार रहमान ने निभाया है, उन्हें बताती है कि वह मां बनने वाली हैं। गिन्नी चाहती हैं कि बच्चे का जन्म किराए के घर में नहीं, बल्कि अपने घर में हो। इसके बाद टुटेजा दिल्ली जैसे महानगर में ऐसा घर खोजने निकल पड़ते हैं, जिसमें कोई वास्तु दोष न हो। इसी तलाश के दौरान उन्हें कई तरह की मुश्किलों, भ्रष्टाचार और समाज की सोच से सामना करना पड़ता है।

फिल्म सिर्फ अंधविश्वास पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि यह भी दिखाती है कि पढ़े-लिखे और आधुनिक लोग भी किस तरह डर और मान्यताओं के जाल में फंस जाते हैं। फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जो हंसाते भी हैं और सोचने पर भी मजबूर करते हैं। कहानी का मूल संदेश शेक्सपीयर की प्रसिद्ध पंक्ति “The fault is not in our stars, but in ourselves” से जुड़ा है, यानी हमारी परेशानियों की वजह सितारे नहीं, बल्कि हमारे अपने फैसले और सोच होती है।अनु कपूर पूरी फिल्म की जान हैं। उन्होंने टुटेजा के किरदार को बेहद सहजता और प्रभावशाली तरीके से निभाया है। भावुक दृश्यों में उनकी अदाकारी दिल को छूती है, जबकि कॉमिक सीन में उनकी टाइमिंग शानदार है। रुखसार रहमान ने भी पत्नी के किरदार में अच्छा काम किया है। वहीं बृजेंद्र काला, पवन मल्होत्रा और अन्य कलाकारों ने अपने-अपने रोल को बखूबी निभाया है।

फिल्म के संवाद कई जगह हंसाते हैं और समाज पर कटाक्ष करते हैं। कुछ गाने भी कहानी के साथ मेल खाते हैं और मनोरंजन का तड़का लगाते हैं। हालांकि फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी अनुमानित (Predictable) कहानी है। कई जगह दर्शक पहले ही समझ जाते हैं कि आगे क्या होने वाला है। अगर पटकथा में थोड़ा और रोमांच और अप्रत्याशित मोड़ होते, तो फिल्म और ज्यादा प्रभाव छोड़ सकती थी।इसके बावजूद ‘उत्तर दा पुत्तर’ एक ऐसी फिल्म है जो मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश भी देती है। यह बताती है कि इंसान को अंधविश्वास नहीं, बल्कि अपने कर्म, तर्क और विवेक पर भरोसा करना चाहिए। यदि आप ऐसी फिल्में पसंद करते हैं जो हंसाने के साथ सोचने पर भी मजबूर करें, तो यह फिल्म आपके लिए एक अच्छा विकल्प साबित हो सकती है।

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