Knews Desk– 9 अगस्त 1942 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की उन तारीखों में शामिल है, जिसने ब्रिटिश हुकूमत को साफ संदेश दे दिया था कि अब भारत में अंग्रेजी शासन ज्यादा समय तक स्वीकार नहीं किया जाएगा. भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत से पहले महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया था. उनका संदेश स्पष्ट था कि अब आजादी के लिए निर्णायक संघर्ष का वक्त आ गया है. लेकिन इस आंदोलन का एक दूसरा राजनीतिक असर भी हुआ. गांधी समेत कांग्रेस के बड़े नेताओं की गिरफ्तारी और लंबे समय तक जेल में रहने के कारण मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना को अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने का अवसर मिला.
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन भारत का समर्थन चाहता था, लेकिन भारतीय नेताओं की मांग थी कि युद्ध में भारत का सहयोग तभी लिया जाए जब उसे आजादी की दिशा में ठोस आश्वासन दिया जाए. इसी सिलसिले में ब्रिटिश सरकार ने सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा. क्रिप्स प्रस्ताव में युद्ध के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस देने और संविधान सभा बनाने की बात कही गई थी. हालांकि कांग्रेस इसे तत्काल सत्ता हस्तांतरण की स्पष्ट योजना नहीं मानती थी. वहीं मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग पर अड़ी हुई थी. प्रस्ताव में प्रांतों को भविष्य में संघ से अलग होने का विकल्प दिए जाने की बात भी थी, जिसे बाद के घटनाक्रम के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया.क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद महात्मा गांधी का रुख और ज्यादा कठोर हो गया. उनका मानना था कि ब्रिटिश सरकार भारत को अपने आप आजाद करने वाली नहीं है, इसलिए अब निर्णायक आंदोलन जरूरी है. अप्रैल और मई 1942 में कांग्रेस के भीतर इस मुद्दे पर चर्चा हुई. गांधी ने अंग्रेजों से भारत को उसके हाल पर छोड़ने की मांग की. उनका तर्क था कि भारत को अपनी समस्याओं का समाधान खुद करने का अवसर मिलना चाहिए.
जुलाई 1942 में वर्धा में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक हुई. यहां गांधी आंदोलन शुरू करने को लेकर बेहद दृढ़ नजर आए. उन्होंने यहां तक कहा कि अगर कांग्रेस उनके प्रस्ताव के साथ नहीं है, तो वह अकेले ही संघर्ष शुरू कर देंगे. हालांकि कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता उस समय आंदोलन शुरू करने को लेकर पूरी तरह सहमत नहीं थे. मौलाना आजाद, जवाहरलाल नेहरू, गोविंद बल्लभ पंत, सैय्यद महमूद और आसफ अली जैसे नेताओं को चिंता थी कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बीच आंदोलन शुरू करने से मित्र राष्ट्रों के प्रयास कमजोर हो सकते हैं.इसके बावजूद 8 अगस्त 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया. गांधी ने जनता से ‘करो या मरो’ का आह्वान किया. लेकिन अगले ही दिन 9 अगस्त को ब्रिटिश सरकार ने गांधी, नेहरू और कांग्रेस के दूसरे बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया. इसके बाद देश के कई हिस्सों में आंदोलन तेज हो गया. जगह-जगह प्रदर्शन, हड़ताल और ब्रिटिश शासन के खिलाफ विरोध देखने को मिला. सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए कड़ी कार्रवाई की.
कांग्रेस नेतृत्व के जेल में चले जाने का राजनीतिक फायदा मुस्लिम लीग को मिला. जिन्ना और उनकी पार्टी को इस दौरान संगठन विस्तार और अपनी राजनीतिक मांगों को मजबूती से आगे बढ़ाने के लिए अपेक्षाकृत ज्यादा जगह मिली. कांग्रेस के सक्रिय राजनीतिक मैदान से दूर रहने के कारण मुस्लिम लीग ने मुस्लिम समाज के बीच अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास किया और पाकिस्तान की मांग को और जोर से उठाया.इस तरह भारत छोड़ो आंदोलन ने ब्रिटिश सत्ता की नींव जरूर हिला दी, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व की गिरफ्तारी ने भारतीय राजनीति में एक ऐसा खाली स्थान भी पैदा किया, जिसका मुस्लिम लीग ने अपने राजनीतिक विस्तार के लिए इस्तेमाल किया.