लाल सागर में हूतियों का खतरा बढ़ा, भारत के तेल और व्यापार पर कितना पड़ेगा असर?

Knews Desk– अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव के साथ अब लाल सागर (Red Sea) एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में नाकेबंदी की घोषणा और सऊदी अरब से भारत व चीन की ओर आ रहे कच्चे तेल के टैंकरों का अपना समुद्री मार्ग बदलना इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है। यदि यह स्थिति लंबी चली, तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है।लाल सागर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक है। इसके दक्षिणी छोर पर स्थित बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। यह संकरा समुद्री रास्ता एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बीच होने वाले बड़े हिस्से के समुद्री व्यापार का प्रवेश द्वार माना जाता है। भारत से यूरोप, पश्चिम एशिया और अफ्रीका जाने वाले हजारों मालवाहक जहाज इसी मार्ग का उपयोग करते हैं।

यमन के हूती विद्रोहियों का इस क्षेत्र में बढ़ता प्रभाव भारत के लिए इसलिए भी चिंता का विषय है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों से आने वाले कई तेल टैंकर लाल सागर और बाब-अल-मंदेब होते हुए भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचते हैं। यदि इस मार्ग पर खतरा बढ़ता है या जहाजों को लंबा वैकल्पिक रास्ता अपनाना पड़ता है, तो तेल की ढुलाई महंगी होगी और इसका असर पेट्रोल, डीजल तथा अन्य ईंधनों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।हाल के घटनाक्रम में भारत और चीन के लिए रवाना हुए सऊदी कच्चे तेल के दो टैंकरों ने सुरक्षा कारणों से अपना मार्ग बदल लिया। यदि अधिक जहाज ऐसा करते हैं, तो उन्हें अफ्रीका के दक्षिणी सिरे केप ऑफ गुड होप के रास्ते होकर जाना पड़ेगा। यह मार्ग हजारों किलोमीटर लंबा है, जिससे यात्रा का समय कई दिन बढ़ जाता है। इसके साथ ही ईंधन, बीमा और परिचालन लागत भी बढ़ती है। अंततः इसका असर वैश्विक व्यापार और उपभोक्ताओं पर पड़ता है।

भारत केवल तेल ही नहीं, बल्कि मशीनरी, खाद्यान्न, रसायन, दवाइयों और अन्य उत्पादों का भी बड़े पैमाने पर आयात-निर्यात करता है। यूरोप के साथ भारत के व्यापार का महत्वपूर्ण हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। यदि लाल सागर में लगातार अस्थिरता बनी रहती है, तो भारतीय निर्यातकों की लागत बढ़ सकती है और सामान की डिलीवरी में देरी हो सकती है। इससे वैश्विक सप्लाई चेन भी प्रभावित होगी।बाब-अल-मंदेब को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ‘चोक-पॉइंट्स’ में गिना जाता है। चोक-पॉइंट ऐसे संकरे समुद्री रास्ते होते हैं, जहां से बड़ी मात्रा में अंतरराष्ट्रीय व्यापार गुजरता है। यदि यहां युद्ध, नाकेबंदी या समुद्री हमलों का खतरा बढ़ जाए, तो पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उसका असर पड़ सकता है। उत्तर में यही मार्ग स्वेज नहर से जुड़ता है, जो एशिया और यूरोप के बीच सबसे छोटा समुद्री रास्ता है। इस मार्ग में किसी भी तरह की बाधा जहाजरानी उद्योग के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है।

भारत लंबे समय से हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को प्राथमिकता देता रहा है। भारतीय नौसेना पहले भी अदन की खाड़ी और आसपास के इलाकों में समुद्री डकैती विरोधी अभियान चला चुकी है। मौजूदा हालात में भी भारत अपने व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिए स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लाल सागर में तनाव जल्द नहीं घटा, तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। भारत जैसे बड़े आयातक और निर्यातक देशों के लिए यह आर्थिक, रणनीतिक और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन सकता है। ऐसे में लाल सागर की स्थिरता केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक और भारतीय हितों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है।

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