Knews Desk- अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह का नाम भारतीय इतिहास में सिर्फ उनके शासनकाल के लिए नहीं, बल्कि उनकी शाही जीवनशैली, कला-प्रेम और विशाल हरम के लिए भी जाना जाता है। कहा जाता है कि उनके हरम में 200 से अधिक बेगमें थीं। हालांकि, ऐश्वर्य और शाही ठाठ के बीच उनका जीवन आर्थिक परेशानियों और अंग्रेजी हुकूमत पर निर्भर पेंशन के संघर्ष से भी भरा रहा। इतिहास में दर्ज कई घटनाएं उनके निजी जीवन और उस दौर की परिस्थितियों की अलग तस्वीर पेश करती हैं।
1856 में खत्म हुआ अवध का शासन
13 मार्च 1856 को अंग्रेजों ने अवध का विलय कर लिया और वाजिद अली शाह को लखनऊ छोड़कर कलकत्ता (अब कोलकाता) जाना पड़ा। वहां उन्होंने गार्डन रीच इलाके में एक छोटे से “मिनी लखनऊ” की स्थापना की, जहां उन्होंने अपने परिवार, दरबारियों और सेवकों के साथ नया ठिकाना बनाया। उनकी आय का मुख्य स्रोत अंग्रेजों से मिलने वाली सालाना पेंशन थी, लेकिन शाही जीवनशैली और बड़े परिवार के कारण खर्च लगातार बढ़ते रहे।
200 से ज्यादा बेगमों का जिक्र
वाजिद अली शाह की आत्मकथा ‘परीखाना’ के अनुसार, वर्ष 1848 तक उनकी 50 से अधिक बेगमें थीं। वहीं, ब्रिटिश अभिलेखों में दर्ज विवरण के मुताबिक उनके परिवार में दो निकाहशुदा पत्नियां, दर्जनों महलात, 176 बेगमें और कई रखैलें थीं। बाद के वर्षों में भी नई शादियां होती रहीं और हरम का दायरा बढ़ता गया।
इतिहासकारों का मानना है कि उनकी कुल बेगमों की संख्या 200 से अधिक रही होगी। हालांकि, विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में यह संख्या अलग-अलग बताई गई है, इसलिए इसे लेकर मतभेद भी मौजूद हैं।
गार्डन रीच में बसाया नया शाही संसार
1857 के विद्रोह के बाद भी वाजिद अली शाह का सीधा संबंध क्रांति से नहीं माना गया, लेकिन अंग्रेजों ने एहतियात के तौर पर उन्हें कुछ समय तक नजरबंद रखा। गार्डन रीच में उनके साथ हजारों लोग रहते थे। ब्रिटिश अधिकारियों की रिपोर्ट के अनुसार वहां सैकड़ों मकान और बंगले बनाए गए थे, जहां बेगमें, रिश्तेदार, सेवक और दरबारी रहते थे।इतने बड़े परिवार और शाही व्यवस्थाओं को बनाए रखने में भारी खर्च होता था, जबकि आय सीमित थी। कई बार उन्हें कर्ज भी लेना पड़ा।
कैसरबाग का खजाना मिला, लेकिन मुश्किलें खत्म नहीं हुईं
1860 में वाजिद अली शाह को बड़ी राहत तब मिली, जब 1857 के विद्रोह के दौरान सुरक्षित रखे गए कैसरबाग के खजाने का एक हिस्सा उन्हें वापस सौंपा गया। इसमें बहुमूल्य रत्न और आभूषणों से भरे 13 बक्से शामिल थे।बताया जाता है कि बाद में इनकी नीलामी से उस समय करीब पांच लाख रुपये की राशि मिली, जो आज के समय में सैकड़ों करोड़ रुपये के बराबर मानी जाती है। बावजूद इसके, बढ़ते खर्चों के सामने यह रकम भी ज्यादा समय तक पर्याप्त साबित नहीं हुई।
पेंशन को लेकर बढ़ता विवाद
वाजिद अली शाह की आर्थिक स्थिति समय के साथ कमजोर होती गई। अंग्रेजों से मिलने वाली पेंशन में कटौती और परिवार के सदस्यों की अलग-अलग आर्थिक मांगों ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दीं। कई बेगमों ने भी सीधे अंग्रेजी सरकार से पेंशन की मांग शुरू कर दी, जिससे नवाब नाराज हो गए।
एक ही दिन में 27 बेगमों को तलाक
इतिहास में दर्ज सबसे चर्चित घटनाओं में से एक वर्ष 1878 की है। रिपोर्टों के अनुसार, वाजिद अली शाह ने एक ही दिन में अपनी मुताह (अस्थायी विवाह) वाली 27 बेगमों को तलाक दे दिया। इससे पहले भी वे कई बेगमों को तलाक दे चुके थे।ब्रिटिश अधिकारियों ने इस फैसले पर आपत्ति जताई और तलाकशुदा महिलाओं के गुजारा भत्ते का मुद्दा उठाया। लेकिन वाजिद अली शाह ने इसे अपना निजी और धार्मिक मामला बताते हुए बाहरी हस्तक्षेप का विरोध किया।
इतिहास और किंवदंतियों के बीच वाजिद अली शाह
वाजिद अली शाह का व्यक्तित्व कई रंगों से भरा हुआ था। वे कवि, संगीतकार, नाटककार और कला के संरक्षक भी थे। दूसरी ओर, उनके निजी जीवन से जुड़ी कई कहानियां ब्रिटिश दस्तावेजों, संस्मरणों और ऐतिहासिक पुस्तकों में दर्ज हैं। हालांकि, उनकी बेगमों की सटीक संख्या, हरम के आकार और कुछ घटनाओं को लेकर अलग-अलग स्रोत अलग-अलग दावे करते हैं।आज भी वाजिद अली शाह का नाम अवध की शाही संस्कृति, संगीत, नृत्य, खान-पान और विलासितापूर्ण जीवनशैली के साथ-साथ उनके विवादित निजी जीवन के कारण इतिहास के सबसे चर्चित शासकों में गिना जाता है।