सोनम रघुवंशी को क्यों मिली थी जमानत और अब क्यों हुई रद्द? जानिए सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

KNEWS DESK – मेघालय के चर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड में मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने उसकी जमानत रद्द करते हुए तीन सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का आदेश दिया है। हालांकि, कोर्ट ने यह राहत भी दी कि यदि अगले छह महीने के भीतर ट्रायल पूरा नहीं होता, तो वह दोबारा जमानत के लिए आवेदन कर सकती है।

तकनीकी खामी के आधार पर मिली थी जमानत

सोनम रघुवंशी को पहले जमानत मामले के तथ्यों के आधार पर नहीं, बल्कि पुलिस की एक तकनीकी गलती के कारण मिली थी। गिरफ्तारी मेमो में हत्या से संबंधित बीएनएस की धारा 103(1) की जगह गलती से 403(1) लिख दिया गया था, जबकि ऐसी कोई धारा अस्तित्व में ही नहीं है।

इसी आधार पर सोनम ने अदालत में दलील दी थी कि उसे गिरफ्तारी के सही कारण नहीं बताए गए, इसलिए उसकी गिरफ्तारी कानूनी रूप से दोषपूर्ण है। निचली अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए जमानत दे दी थी, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। इसके बाद मेघालय सरकार इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ले गई।

सुप्रीम कोर्ट में मेघालय सरकार की दलील

राज्य सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि गिरफ्तारी मेमो में धारा लिखने में हुई टाइपिंग की गलती को आधार बनाकर हत्या जैसे गंभीर अपराध में जमानत नहीं दी जा सकती।

उन्होंने अदालत को बताया कि सोनम ने कथित तौर पर पहले सुनियोजित तरीके से अपने पति की हत्या की साजिश रची और बाद में सह-आरोपियों की सलाह पर सरेंडर किया। उनके अनुसार, सरेंडर करना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सोनम को अपने खिलाफ लगे आरोपों और पुलिस कार्रवाई की पूरी जानकारी थी।

कोर्ट ने पहले दिए थे दो विकल्प

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सोनम को दो विकल्प दिए थे। पहला, वह जमानत पर कानूनी बहस जारी रखे और अदालत उपलब्ध तथ्यों के आधार पर फैसला सुनाए। दूसरा, वह सरेंडर कर दे और गवाहों के बयान पूरे होने के बाद नई जमानत याचिका दायर करे।

सुनवाई के दौरान सोनम के वकील ने सरेंडर का विकल्प नहीं चुना। उन्होंने अदालत को बताया कि मामले में अभी तक केवल चार गवाहों के बयान दर्ज हुए हैं, जबकि कुल 94 गवाहों की गवाही होनी बाकी है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों रद्द की जमानत?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि गिरफ्तारी के कारण बिल्कुल न बताना और कारणों में तकनीकी त्रुटि होना, दोनों अलग-अलग स्थितियां हैं। इस मामले में ऐसा नहीं था कि सोनम को गिरफ्तारी के कारण बताए ही नहीं गए।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि आरोपी को कारणों की जानकारी दी गई हो और केवल दस्तावेज में तकनीकी गलती हो, तो यह देखना जरूरी है कि उससे आरोपी को वास्तव में कोई कानूनी नुकसान हुआ या नहीं।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि सोनम ने अपनी शुरुआती तीन जमानत याचिकाओं में कभी यह दावा नहीं किया कि उसे गिरफ्तारी के कारण नहीं बताए गए थे। इसके अलावा उसने मजिस्ट्रेट के सामने यह स्वीकार भी किया था कि उसे गिरफ्तारी के आधार और संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराए गए थे। मजिस्ट्रेट ने भी रिकॉर्ड में नियमों के पालन का उल्लेख किया था। ऐसे में केवल तकनीकी त्रुटि के आधार पर जमानत देना उचित नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि मामले के उपलब्ध तथ्यों और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए सोनम रघुवंशी फिलहाल जमानत की अधिकारी नहीं है। इसी आधार पर निचली अदालत और हाईकोर्ट के जमानत आदेशों को रद्द कर दिया गया।

सुनवाई के दौरान कोर्ट की सामाजिक टिप्पणी

आदेश सुनाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने समाज में तेजी से हो रहे बदलावों पर भी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि आज की पीढ़ी पहले की तुलना में अधिक जानकारी रखती है, लेकिन मानसिक दबाव सहने की क्षमता कम हो गई है।

कोर्ट ने कहा कि पहले संयुक्त परिवारों में बच्चों को दादा-दादी, चाचा-चाची और अन्य परिजनों से भावनात्मक सहारा और जीवन के अनुभव मिलते थे। वहीं, एकल परिवारों में लोग छोटी-छोटी बातों से तनाव में आ जाते हैं और हर समस्या का तत्काल समाधान चाहते हैं।

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