युद्ध के साये में भी रफ्तार नहीं थमी! भारत की GDP और बैंक क्रेडिट में दिखी मजबूती

KNews Desk– भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के GDP आंकड़े बेहद अहम होने वाले हैं। सोमवार, 31 अगस्त को जारी होने वाले आंकड़ों से पहले सामने आए आर्थिक संकेतक बताते हैं कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और महंगाई के दबाव के बावजूद भारतीय इकोनॉमी की रफ्तार मजबूत बनी हुई है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अप्रैल-जून तिमाही में GDP ग्रोथ करीब 7 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है, जबकि कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वृद्धि दर 7.5 से 8 फीसदी तक पहुंच सकती है।

भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का सबसे बड़ा संकेत बैंक क्रेडिट की बढ़ती मांग से मिल रहा है। RBI के आंकड़ों के मुताबिक जून 2026 के अंत तक बैंकों के नॉन-फूड क्रेडिट में सालाना आधार पर 18.3 फीसदी की वृद्धि हुई। किसी वित्त वर्ष की पहली तिमाही के अंत में यह जून 2012 के बाद सबसे तेज क्रेडिट ग्रोथ है। इससे संकेत मिलता है कि कंपनियों और आम लोगों की आर्थिक गतिविधियों में तेजी आई है और कारोबार के विस्तार के लिए कर्ज की मांग बढ़ी है।सेक्टरवार आंकड़ों पर नजर डालें तो इंडस्ट्री को दिए गए बैंक लोन में 19.2 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि सर्विस सेक्टर के बैंक क्रेडिट में 21.4 फीसदी और पर्सनल लोन में 15.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। जून 2025 में इंडस्ट्री, सर्विस और पर्सनल लोन की वृद्धि दर क्रमशः 6.3 फीसदी, 8.8 फीसदी और 11.7 फीसदी थी। यानी पिछले एक साल में खास तौर पर इंडस्ट्री और सर्विस सेक्टर की क्रेडिट मांग में बड़ी तेजी आई है।

अर्थशास्त्रियों के मुताबिक यह बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। कोरोना महामारी के बाद बैंक क्रेडिट की मांग में पर्सनल लोन की हिस्सेदारी ज्यादा रही थी, लेकिन अब इंडस्ट्री और सर्विस सेक्टर की ओर कर्ज का रुख बढ़ रहा है। इसका मतलब है कि कंपनियां उत्पादन बढ़ाने, नए निवेश करने और कारोबार का विस्तार करने के लिए कर्ज ले रही हैं। यह आर्थिक गतिविधियों के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।भारत में क्रेडिट की बढ़ती मांग अकेली कहानी नहीं है। मॉर्गन स्टेनली के अनुसार, चीन को छोड़कर एशिया में बैंक क्रेडिट ग्रोथ 8.5 फीसदी तक पहुंच गई है, जो करीब 18 वर्षों में सबसे ज्यादा है। AI और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, रक्षा और इंडस्ट्रियल सप्लाई चेन में बढ़ता कैपेक्स इस तेजी की बड़ी वजह माना जा रहा है। इससे संकेत मिलता है कि एशियाई अर्थव्यवस्था एक मजबूत औद्योगिक चक्र में प्रवेश कर रही है।

कॉरपोरेट सेक्टर के प्रदर्शन ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है। अप्रैल-जून तिमाही में लिस्टेड प्राइवेट नॉन-फाइनेंशियल कंपनियों की बिक्री में सालाना आधार पर 19.4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। वहीं कंपनियों के ऑपरेटिंग प्रॉफिट में 19.3 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। खास बात यह है कि यह प्रदर्शन ऐसे समय में आया जब पश्चिम एशिया के संघर्ष के कारण कच्चे माल की लागत 25.3 फीसदी और बिजली एवं ईंधन खर्च 19.3 फीसदी बढ़ गया था।इन चुनौतियों के बावजूद बिक्री और मुनाफे में तेजी बताती है कि घरेलू मांग और मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। हालांकि, आगे की राह पूरी तरह आसान नहीं है। पश्चिम एशिया का संघर्ष, कच्चे तेल की कीमतें, महंगाई और वैश्विक अनिश्चितता भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल सकती है। ऐसे में Q1 GDP का आंकड़ा यह तय करने में महत्वपूर्ण होगा कि भारत ने इन बाहरी झटकों का सामना कितनी मजबूती से किया है। अगर GDP ग्रोथ 7.5 से 8 फीसदी के करीब रहती है, तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का बड़ा संकेत माना जाएगा।

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